संदेश

prem kahaniya लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक शाम साथ में गुजारें।

  आओ कुछ पल साथ बैठते हैं, किसी पेड़ की छांव में, किसी नदी के पार से देखते हैं डूबता सूरज, जिसकी किरणें , तुम्हारे चेहरे को चमका रही हैं, आओ एक प्याली चाय लेकर, कुछ पुरानी बातों के संग, उस गुलाबी कुर्ते में जिसमें तुम्हारा सांवला रंग, चाय के रंग को मात दे दे, ना तुमको जाने की जल्दी, ना मुझको रुकने का ग़म हो, चुपचाप ही बैठे रहे, बातें चाहे थोड़ी कम हों, उस शाम को सूरज को, ओझल होने तक निहारें चलो एक शाम साथ में गुजारें। ---अभिषेक  अन्य कविताएं-  आखिर, किसने है।     कोरे पन्ने

सावन की बूंदें

 चारू आज बहुत खुश थी , हो भी क्यों ना आखिर आज वह अपने चाचा के साथ शहर रहने जो जा रही थी ꫰ छोटी सी बच्ची अपनी जितनी यादों को समेट पायी समेटती रही ꫰ गांव की माटी ,बाग़ का पीला फूल जिसे वह गेंदवा कहती थी , गुड़िया, माँ की काजल की डिबिया ,बापू की कलम , सहेलियों की चोटी केे फीते सब तो रख लिया उसने फिर उसे ऐसा क्यों लग रहा था कि जैसे वो कुछ भूल रही है , नहीं शायद वो कुछ नहीं भूली ꫰ "चारू" चाचा ने पुकारा तो वह फुदकती हुई चाचा के पास चली गयी ꫰ "चारू चलें ?" , "हाँ चाचा अब मुझे इस गाँव में नहीं रहना ꫰" चारू सुबकती हुई बोली ꫰ वह इस गाँव से नाराज है ꫰ आज के तीन बरस पहले इसी गाँव में बाढ़ की चपेट में आये माँ बाप को उसने खो दिया था ꫰ " ऊपर चढ़ लड़की " चाचा ने टोका ꫰ बड़ी सफेद रंग की गाड़ी पहली बार तो देखी थी उसने꫰ जैसे ही गाड़ी में पहला कदम रखा उसे किसी ने रोका , " रुक चारू "पीछे मुड़कर देखा तो उसकी सहेली नाजिया हाथ में कुछ लिए खड़ी थी ꫰ " ये क्या है री ?", " देखती नहीं तेरे लडडू गोपाल लायी हूँ , जो तेरा हमेशा ख्याल रखते हैं तू उन्हें ही...