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कोरे पन्ने

आज फिर कुछ खाली पन्ने लेकर बैठा हूँ, बिल्कुल कोरे बिल्कुल खरे, बिल्कुल मेरे बालमन जैसे, वैसे जैसे कॉपी की शुरुआत में होते हैं। बिल्कुल साफ बिल्कुल सुंदर, बिल्कुल मेरे बालकर्म जैसे, वैसे जैसे कॉपी की पहली लिखावट होती है। कुछ नीला कुछ काला रंग, बिल्कुल खट्टी मीठी यादों जैसे, वैसा जैसा बिल्कुल पहला पाठ होता है। पर ये तो 20 वां पाठ है, अब तक जाने कितने पन्ने रंग डाले, कुछ सुंदर कुछ गड़बड़ से, कुछ बिल्कुल बदसूरत से, वैसे जैसे कॉपी का आखिरी पन्ना होता है। पर फिर नया पाठ शुरू होता है, नई कॉपी शुरू होती है, वैसे जैसे फिर से नया दिन शुरू होता है। अब वो कोरे पन्ने मेरे हैं, अब मैं समझदार हूँ, वैसे जैसे किताबों के लेखक होते हैं। अब इन पन्नों पर सुंदर लिखना है, बिल्कुल पहले पन्ने जैसा हर पन्ना, वैसे जैसे लेखक किताब लिखते हैं। पर वादा है फिर गलती होगी, फिर कहीं न कहीं गड़बड़ होगी, वैसे जैसे डायरी पर विचारों को काट देता हूँ। क्योंकि पन्ने मेरे हैं, विचार मेरे हैं, जो करना है अब अपने अंदाज़ में करता हूँ।  ---©अभिषेक  इन्हें भी पढ़ें- कौन हो तुम? मैं त...

शायरी संग्रह ( मेरी वफ़ा के नगमे )

(1) खाके बेवफाई की ठोकर मन भर गया मोहब्बत से, वरना हम भी थे किसी के आशिक अभी कल की ही बात है| (2) ऐ खुदा, सर भी न दिखे उस बेवफा का, जिसने मेरा दिल दुखाया है| (3) जो पूछते थे छोड़कर तो ना जाओगे, वो आज मुंह मोड़कर जा रहे हैं| (4) सभी की जुबान पर मेरे लिए जिसका नाम है उसे भी खबर नहीं कि मेरी जुबां पर उसी का नाम है| (5) शुक्र है खुदा का कि आँखों का पानी रंगहीन हैं, अगर रंगीन होता तो उनकी बेवफाई का भी निशान होता| (6) हमें तो मोहब्बत ने ऐसे तरसा दिया, जैसे कि पिंजरों में पंछी उन्मुक्त गगन के| (7) दिल में जो अंगारे जलाये बैठे हैं, मुस्कराहट से सबसे छिपाए बैठे हैं| कह ना सके कोई उन्हें बेवफा इसलिए खुद ही बेवफाई किये बैठे हैं| उठना, चलना, और गिर पड़ना, कमजोरी नहीं है| इसे तो हम मोहब्बत का पैमाना बनाये बैठे हैं|                                             ...