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एक शाम साथ में गुजारें।

  आओ कुछ पल साथ बैठते हैं, किसी पेड़ की छांव में, किसी नदी के पार से देखते हैं डूबता सूरज, जिसकी किरणें , तुम्हारे चेहरे को चमका रही हैं, आओ एक प्याली चाय लेकर, कुछ पुरानी बातों के संग, उस गुलाबी कुर्ते में जिसमें तुम्हारा सांवला रंग, चाय के रंग को मात दे दे, ना तुमको जाने की जल्दी, ना मुझको रुकने का ग़म हो, चुपचाप ही बैठे रहे, बातें चाहे थोड़ी कम हों, उस शाम को सूरज को, ओझल होने तक निहारें चलो एक शाम साथ में गुजारें। ---अभिषेक  अन्य कविताएं-  आखिर, किसने है।     कोरे पन्ने

आखिर, किसने है।

इश्क को इश्क का नाम आखिर दिया किसने है, मुझको तुझे इनाम में आखिर दिया किसने है। जो मांगा था टुकड़ा चांद का ये पूरा चांद दिया किसने है, हूर हो या ख्वाब, ऐसा श्रंगार आखिर किया किसने है। तुम राधा हो तो मुझे श्याम आखिर कहा किसने है, ये यारी को बदनाम आखिर किया किसने है। मुझको तुझे इनाम में आखिर दिया किसने है।                                 इन्हें भी पढें- कोरे पन्ने                                                   मैं तो बस मैं हूँ। ---- अभिषेक

तुम तो निर्णय कर चुकी।

आज है बस मेरे पास, कल तू कहीं मैं कहीं, सोचता हूँ कह दूं तुझे, पर क्या शब्द वो काम करेंगे, शब्दों में कैसे पिरोऊँ वो बातें, जिन्हें समेटने में सालों लगे, अब सोचता हूँ कह दूं, पर क्या करोगी सुनकर, तुम तो निर्णय कर चुकी हो, सौ बार सोच समझ चुकी हो।                     इसे भी पढ़ें- कौन हो तुम? तुमको मुझसे क्या, मैं तो जैसे हवा का झोंका था, आया और बाल बिखरा गया, सच तो ये है कि मैं कुछ लाया था, हां वही अजीब सी सुगन्ध, जो तुमको उर्जावान करती थी, जो तुमको छूकर महक उठती थी, जो हर बार तुझे झकझोरती थी, तुझसे कहने की कोशिश करती थी, मेरी कहानी, पर तुमको क्या?, तुम तो निर्णय कर चुकी थी। --©अभिषेक

अब जब चाय बने तब,

जब पानी में शक्कर घुले तब आना तुम, जब चाय की लाली चढ़े तब आना तुम, एक अदरक सी कड़क बात बोलेंगे, सारे उलझे हुए रिश्ते के तार खोलेंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम। खुशबू मिले इलायची की तब आना तुम, दूध पर गेहुंआ रंग चढ़े तब आना तुम, छन्नी सी बातों से कड़वाहट हटाएंगे, पकड़ के सहारे रिश्ते कप बनाएंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम।  ----©अभिषेक