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एक शाम साथ में गुजारें।

  आओ कुछ पल साथ बैठते हैं, किसी पेड़ की छांव में, किसी नदी के पार से देखते हैं डूबता सूरज, जिसकी किरणें , तुम्हारे चेहरे को चमका रही हैं, आओ एक प्याली चाय लेकर, कुछ पुरानी बातों के संग, उस गुलाबी कुर्ते में जिसमें तुम्हारा सांवला रंग, चाय के रंग को मात दे दे, ना तुमको जाने की जल्दी, ना मुझको रुकने का ग़म हो, चुपचाप ही बैठे रहे, बातें चाहे थोड़ी कम हों, उस शाम को सूरज को, ओझल होने तक निहारें चलो एक शाम साथ में गुजारें। ---अभिषेक  अन्य कविताएं-  आखिर, किसने है।     कोरे पन्ने

न जानो मुझे|

न देखो मुझे, न जानो मुझे, दूर रहो अब मुझसे तुम, बेहतर है न पहचानो मुझे।                                                          इसे भी पढ़ें- 70 बरस नहीं हैं थक गया हूँ खिलौना बनकर, कभी ज्यादा तो कभी थोड़ा बनकर, बेहतर है आज़ाद मर जाने दो मुझे।                                                           इसे भी पढ़ें- जवाब नहीं मिलते न अभी तक ऐसा कोई आया है, जो मेरे हाल-ए-दिल को समझ पाया है, छोड़ो अब एक पहेली ही रह जाने दो मुझे।   ...