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मैं तो बस मैं हूँ

मैं तो बस मैं हूँ, न मुझे राह की परवाह है, मुझे न डर, न  सुकून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कौन हो तुम? लड़ता हूँ खुद से, हर हार का हमराही हूँ, मुझे न जीत, न जुनून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया। जो मंज़िल दूर है, तो रहने दो उसे दूर ही मुझसे, न गाड़ी, न पत्थर का मकान चाहिए। जो कहते हैं तुमसे, कि बनो बेहतर हर जगह पर, न उपलब्धि, न ही मुझे नाम चाहिये। हां चुनता हूँ शब्द, क्योंकी न समझाना है खुद को, न लोगों का झूठा यक़ीन चाहिए। कैसे छोड़ दूं हर सीख को, जब भी गिरा हूँ, उठा हूँ, वापस बढ़ा हूँ, मुझे न जीतना है न इनाम चाहिए। मुझसे कहती है मेरी माँ, मुझे तू अफसर जैसा नहीं, बस एक बेहतर इंसान चाहिए। ---©अभिषेक

कविता संख्या 12(मैंने खुद को बड़ा होते देखा है)

आज मैंने अपने बचपन को मुड़कर देखा है, बचपन के उस भोलेपन को भी देखा है| तब ख़्वाबों की दुनिया बसाई थी मैंने, और छोटे-छोटे ख़्वाबों को मुक्कमल होते देखा है| फिर अपनी नींद से ख़्वाबों को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|                 इसे भी पढ़ें- जवाब नहीं मिलते मुझे अपनी वो ज़िद भी याद है, मैंने नानी को ज़िद पूरा करते देखा है| जब-जब परेशान हुआ हूँ हालातों से, मैंने उनकी गोद का नज़ारा भी देखा है| फिर अपने सर को गोद से अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|                 इसे भी पढ़ें- हम दूर हो जायेंगे मुझे बचपन के आंसुओं की नदियाँ भी याद हैं, हर बात पे अपना पसर जाना भी देखा है| मैं आंसुओं से अपनी बात मनवाता था, इस बात पे माँ बाप का दुलार भी देखा है| फिर अपनी आँखों से आंसुओं को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|          ...