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सावन की बूंदें

 चारू आज बहुत खुश थी , हो भी क्यों ना आखिर आज वह अपने चाचा के साथ शहर रहने जो जा रही थी ꫰ छोटी सी बच्ची अपनी जितनी यादों को समेट पायी समेटती रही ꫰ गांव की माटी ,बाग़ का पीला फूल जिसे वह गेंदवा कहती थी , गुड़िया, माँ की काजल की डिबिया ,बापू की कलम , सहेलियों की चोटी केे फीते सब तो रख लिया उसने फिर उसे ऐसा क्यों लग रहा था कि जैसे वो कुछ भूल रही है , नहीं शायद वो कुछ नहीं भूली ꫰ "चारू" चाचा ने पुकारा तो वह फुदकती हुई चाचा के पास चली गयी ꫰ "चारू चलें ?" , "हाँ चाचा अब मुझे इस गाँव में नहीं रहना ꫰" चारू सुबकती हुई बोली ꫰ वह इस गाँव से नाराज है ꫰ आज के तीन बरस पहले इसी गाँव में बाढ़ की चपेट में आये माँ बाप को उसने खो दिया था ꫰ " ऊपर चढ़ लड़की " चाचा ने टोका ꫰ बड़ी सफेद रंग की गाड़ी पहली बार तो देखी थी उसने꫰ जैसे ही गाड़ी में पहला कदम रखा उसे किसी ने रोका , " रुक चारू "पीछे मुड़कर देखा तो उसकी सहेली नाजिया हाथ में कुछ लिए खड़ी थी ꫰ " ये क्या है री ?", " देखती नहीं तेरे लडडू गोपाल लायी हूँ , जो तेरा हमेशा ख्याल रखते हैं तू उन्हें ही...

आखिर, किसने है।

इश्क को इश्क का नाम आखिर दिया किसने है, मुझको तुझे इनाम में आखिर दिया किसने है। जो मांगा था टुकड़ा चांद का ये पूरा चांद दिया किसने है, हूर हो या ख्वाब, ऐसा श्रंगार आखिर किया किसने है। तुम राधा हो तो मुझे श्याम आखिर कहा किसने है, ये यारी को बदनाम आखिर किया किसने है। मुझको तुझे इनाम में आखिर दिया किसने है।                                 इन्हें भी पढें- कोरे पन्ने                                                   मैं तो बस मैं हूँ। ---- अभिषेक

कोरे पन्ने

आज फिर कुछ खाली पन्ने लेकर बैठा हूँ, बिल्कुल कोरे बिल्कुल खरे, बिल्कुल मेरे बालमन जैसे, वैसे जैसे कॉपी की शुरुआत में होते हैं। बिल्कुल साफ बिल्कुल सुंदर, बिल्कुल मेरे बालकर्म जैसे, वैसे जैसे कॉपी की पहली लिखावट होती है। कुछ नीला कुछ काला रंग, बिल्कुल खट्टी मीठी यादों जैसे, वैसा जैसा बिल्कुल पहला पाठ होता है। पर ये तो 20 वां पाठ है, अब तक जाने कितने पन्ने रंग डाले, कुछ सुंदर कुछ गड़बड़ से, कुछ बिल्कुल बदसूरत से, वैसे जैसे कॉपी का आखिरी पन्ना होता है। पर फिर नया पाठ शुरू होता है, नई कॉपी शुरू होती है, वैसे जैसे फिर से नया दिन शुरू होता है। अब वो कोरे पन्ने मेरे हैं, अब मैं समझदार हूँ, वैसे जैसे किताबों के लेखक होते हैं। अब इन पन्नों पर सुंदर लिखना है, बिल्कुल पहले पन्ने जैसा हर पन्ना, वैसे जैसे लेखक किताब लिखते हैं। पर वादा है फिर गलती होगी, फिर कहीं न कहीं गड़बड़ होगी, वैसे जैसे डायरी पर विचारों को काट देता हूँ। क्योंकि पन्ने मेरे हैं, विचार मेरे हैं, जो करना है अब अपने अंदाज़ में करता हूँ।  ---©अभिषेक  इन्हें भी पढ़ें- कौन हो तुम? मैं त...

मैं तो बस मैं हूँ

मैं तो बस मैं हूँ, न मुझे राह की परवाह है, मुझे न डर, न  सुकून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कौन हो तुम? लड़ता हूँ खुद से, हर हार का हमराही हूँ, मुझे न जीत, न जुनून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया। जो मंज़िल दूर है, तो रहने दो उसे दूर ही मुझसे, न गाड़ी, न पत्थर का मकान चाहिए। जो कहते हैं तुमसे, कि बनो बेहतर हर जगह पर, न उपलब्धि, न ही मुझे नाम चाहिये। हां चुनता हूँ शब्द, क्योंकी न समझाना है खुद को, न लोगों का झूठा यक़ीन चाहिए। कैसे छोड़ दूं हर सीख को, जब भी गिरा हूँ, उठा हूँ, वापस बढ़ा हूँ, मुझे न जीतना है न इनाम चाहिए। मुझसे कहती है मेरी माँ, मुझे तू अफसर जैसा नहीं, बस एक बेहतर इंसान चाहिए। ---©अभिषेक

कौन हो तुम?

कौन हो तुम? जो अंधेरों को उजालों से भरे जा रहे हो, जो दुर्गम राहों पर निडर चले जा रहे हो।                             इसे भी पढ़ें- जब चाय बने तब आना तुम कौन हो तुम? जो मृत्यु के भय से भयभीत भी है जो हर डर को हरा दे ऐसी जीत भी है।                             आखिर कौन हो तुम? जो बस प्रहरी को भांति खड़ा है , जो निराकार होकर भी बहुत बड़ा है।                            इसे भी पढ़ें- अधूरा एहसास हो कौन तुम? जिसको न कल की परवाह थी, जिसको न कल की परवाह है।                           हो कौन तुम? जो न तो प्रत्यक्ष है, न ही परोक्ष है।                            इसे भी पढ़ें- कर्म लौटकर आया हो कौन तुम? जिसे सब साहस कहते हैं, दुःख में जिसे ढाँ...

संगी कविता

(1) ठहर जाओ कुछ पल के लिए क्यों टालती हो हर बात कल के लिए, जो पूछता हूँ बस बोल दो क्यों सकुचाती हो पहल के लिए, लो बात जो तुम कहती वो शुरू मैं कर रहा हूँ, तुम हां या न कह दो, मैं तो कब से तुमको सुन रहा हूँ। ----©अभिषेक (2) आ गया हूं  खुद को भी छोड़कर छोड़कर बंधन सारे, सारी रश्में, रश्में जो बांधती थीं मुझको घर से, घर से निकला हूँ यह सोचकर, सोचकर कि तुममे सिमट जाऊंगा जाऊंगा जहाँ तुम साथ हो, हो चाहें जहां या सिर्फ हो आसमां, आसमां ही छत होगी ज़मीन बिस्तर, बिस्तर पर मैं तुझमें सिमट जाऊंगा।  --©अभिषेक

याद उन यारों की।

कुछ यारों की याद आज भी आती है, जो आंखों से बूंदों की बरसात भी लाती है, अविस्मरणीय यादों की ठंडी हवा, हौले से गालों को छूकर जाती है। पर हम बड़े हो गए हैं और सब बदल गया है, वो लम्हा एक सपने सा फिसल गया है।                             इसे भी पढ़ें- कुछ ख़्वाहिशें हैं तुमसे वो सारी बातें हम बहुत पीछे छोड़ आये हैं, यादों को डायरी के पन्नों में मोड़ आये हैं। वो जो मोड़ पर छोड़ आये हैं, एक सुनहरी दुनिया, मंज़िल पर मिलेंगे हम फिर, ऐसे वादों से राहों को जोड़ आये हैं। इन समझदारों की दुनिया के काबिल बनने को, कुछ नासमझ से रिश्तों को तोड़ आये हैं।                                इसे भी पढ़ें- अधूरा एहसास हां यारों की यारी अब हमारी हमराही नहीं, पर हर जज़्बात को बक्से में समेट लाये हैं। खुद ही जलाए थे जो दिए प्यार के, उन्हें राहों में यूँही जलता छोड़ आये हैं। हां हम उन्हें उनकी दुनिया में, किसी और के हाथों सौंप आये हैं।      -...

कुछ ख़्वाहिशें हैं तुमसे

एक गुज़ारिश है तुमसे, जब बाल खोल कर आया करो, लटों को यूं सहलाया न करो, हटा कर केश चेहरे से जाल से बिखराया न करो।                        इसे पढ़ें-    अधूरा एहसास एक और गुज़ारिश है, जब कुछ बोलूं तो इठलाया न करो, अपने गालों को हौले से सहलाया न करो, गुस्से में होती हो तो बस लबों को दांतों से दाबाया न करो।                         इसे पढ़ें-  नज़रों के मिलते ही एक नन्हीं गुज़ारिश और है, जब भी देखूं तो मुझे देख मुस्काया न करो, हर बात की मेरी नकल दोहराया न करो, जानती हो तुम मुझे शिकवा नहीं तो हर बात का मतलब समझाया न करो।                          इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया है गुज़रिशें तो और बहुत हैं, वो जो हौले से हाथों को छू जाती हो, मेरी हर कविता के भाव में खो जाती हो, जो छू जाते हैं शब्द सागर की लहरों से, तो क्यों नहीं मुझे सपनों में  चूम जाती हो।       ...

अधूरा एहसास

कोई राज़ है, अल्फ़ाज़ में कोई आज है, कोई आज में।                   इसे पढ़ें- लघु कथा( कर्म लौटकर आया) तुम कौन हो?, मैं कौन हूँ?, एक साज़ है एक साज़ में। तुम शोर हो, मैं शांत हूँ, एक बात है एक बात में।                 इसे पढें- सफर लम्बा था क्या? तुम सर्व हो मैं शून्य हूँ, एक पाठ है, एक पाठ में। वो नाम है, वो गुमनाम है, एक शाम है, एक शाम में।                  इसे पढ़ें- न जानो मुझे वो प्यास है, वो दर्द है, एक आस है, एक आस में। जो लिख दिया, जो न लिखा, एक सार है, एक सार में।                  इसे पढ़ें- वो मज़दूर है साहब। कुछ बात है, कुछ खास है, इस अधूरे एहसास में।          -----©अभिषेक

वो मजदूर है साहब|

वो चलता है मीलों फिर भी, उसके चलने की आवाज़ नहीं होती| उठाता है भार क्षमता से अधिक, फिर भी आवाज़ में उसकी आह नहीं होती| वो मजदूर है साहब, फटा पहनता है, नंगे पैर चलता है, क्योकि और अधिक की उसे प्यास नहीं होती|                                              इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया(कहानी) वो सुनता है कटाक्ष और गालियाँ, उसे प्यार भरे शब्दों की चाह नहीं होती| चाहता है दो जून की रोटी और दाल, पर वो मजदूर है साहब, सूखी रोटी तो होती है, पर कटोरी में दाल नहीं होती|                                               इसे पढ़ें- जाने क्यों हमको भूल गए?( कविता ) नींद की वजह से वो तारे नहीं गिन पाता, बरसात में कोई अचकन सूखी नहीं होती| आखिर वो मजदूर है साहब, उसके पैरों तले ज़मीन तो होती है, पर सर पर छत नही होती|             ...

जाने क्यों हमको भूल गए!

हवा बसंती इठलाकर जो छू ले लू सी हो जाये, जो पुष्प मनोहर सुगंध बिखेरे मुरझा वो सारे फूल गए, जो कहते थे कि संगी हैं हम अब जाने क्यों हमको भूल गए? मधुर लगी वाणी जिनकी उनके शब्द शूल ...

न जानो मुझे|

न देखो मुझे, न जानो मुझे, दूर रहो अब मुझसे तुम, बेहतर है न पहचानो मुझे।                                                          इसे भी पढ़ें- 70 बरस नहीं हैं थक गया हूँ खिलौना बनकर, कभी ज्यादा तो कभी थोड़ा बनकर, बेहतर है आज़ाद मर जाने दो मुझे।                                                           इसे भी पढ़ें- जवाब नहीं मिलते न अभी तक ऐसा कोई आया है, जो मेरे हाल-ए-दिल को समझ पाया है, छोड़ो अब एक पहेली ही रह जाने दो मुझे।   ...

बेवफ़ा चांद

चांद भी अमावस को गायब हुआ किसी और के दीदार को। लो उठा दिया है पर्दा हमने, अब सफाई न दे संसार को। इसे भी पढ़ें- सफ़र लम्बा था क्या? जो पढ़ लिया है ख़ता खत अपना, तो चले जाओ जहां जाते रहते हो। नही भा रही अब चांदनी तुम्हारी, क्यों मुझे इनसे झुलसा रहे हो। इसे भी पढ़ें- 70 बरस नहीं हैं वो झूठे मोहब्बत के वादे हैं सारे, जो तुम सभी से किये जा रहे हो। घटती हैं तेरी हर पक्ष कलाएं, फिर भी रूप पे क्यो इतरा रहे हो। इसे भी पढ़ें- कविता संख्या 1 आशिकों के इश्क़ को उड़ान देकर क्यों तुम उन्हें उन्हीं से हरा रहे हो। लो कह दिया हर गिला तुमसे, फिर भी मुझ पर मुस्करा रहे हो। चांद हो तो क्या हुआ, बदकिस्मत हो बस दिन रात चले जा रहे हो।                              -----------------------------©अभिषेक

कविता संख्या 13 (बेटियां बोझ नहीं होती)

        इसे भी पढ़ें- कविता संख्या 8                           जवाब नहीं मिलते बचपन में प्यार की थपकी दी थी, आज फिर से गले लगाओ न पापा| हाथ पकड़ के चलना सिखाया, आज गिरने से बचा लो न पापा| लोरी सुना के सपने दिखाए, आज उन्हें पूरा करने से न रोको पापा| हर गम से दूर रखा था मुझे, आज ज़ख्मों पे नमक न डालो पापा| दुनिया की सारी ख़ुशी क़दमों में रखी थी, आज दर्द दे कर न रुलाओ पापा| ऊँचा उड़ने की सीख सिखाकर, आज उड़ने से तो न रोको पापा| मेरी हर ख्वाहिश  को पूरा किया है, आज उसे मेरा बना दो न पापा| एक गलती हो गयी मुझसे, उसकी यूँ सजा तो न दो पापा| माना बेटी हूँआपकी, एक बार बेटा बनाके गले लगाओ न पापा| आपकी मुस्कान अच्छी है, बस मेरे लिए एक बार, मेरे लिए मुस्कराओ न पापा| दुनिया बहुत मतलबी है, मुझे अपने साए में छुपाओ न पापा| सबने अकेले छोड़ दिया है, आप तो मुंह मोड़कर न जाओ पापा|     एक दिन तो मुझे जाना ही है, कुछ दिन तो साथ बिठाओ न पापा|  बहुत तडपी ह...

कविता संख्या 12(मैंने खुद को बड़ा होते देखा है)

आज मैंने अपने बचपन को मुड़कर देखा है, बचपन के उस भोलेपन को भी देखा है| तब ख़्वाबों की दुनिया बसाई थी मैंने, और छोटे-छोटे ख़्वाबों को मुक्कमल होते देखा है| फिर अपनी नींद से ख़्वाबों को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|                 इसे भी पढ़ें- जवाब नहीं मिलते मुझे अपनी वो ज़िद भी याद है, मैंने नानी को ज़िद पूरा करते देखा है| जब-जब परेशान हुआ हूँ हालातों से, मैंने उनकी गोद का नज़ारा भी देखा है| फिर अपने सर को गोद से अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|                 इसे भी पढ़ें- हम दूर हो जायेंगे मुझे बचपन के आंसुओं की नदियाँ भी याद हैं, हर बात पे अपना पसर जाना भी देखा है| मैं आंसुओं से अपनी बात मनवाता था, इस बात पे माँ बाप का दुलार भी देखा है| फिर अपनी आँखों से आंसुओं को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|          ...

कविता संख्या 7( मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा )

ना मैं दशरथ का बेटा हूँ, न कान्हा सा बन पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना कर्ण के जैसा मित्र हूँ मैं, न तेरा राँझा बन पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं  तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना मैं ख़त की प्यारी वाणी हूँ, न प्रेमगीत बन पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना फूल हूँ तेरी माला का, न तेरी पायल का घुंघरू बन पाऊंगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना उपहार हैं तुझको देने को, न सिनेमा देखने जा पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना राज़ बता तू मुझको कोई, मैं हमराज़ नहीं बन पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| मैं व्यक्ति हूँ स्वनिर्मित आदर्शो का, इसी पथ पे चलता जाऊँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा|                                        ...