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जो मिली दोबारा हमसे तो,

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जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम, कुछ अपना कहती दर्द और, हाल हमारा सुनती तुम, या चुप रहती बस आंखों को, राज़ उगलने देती तुम, लफ्ज़ तुम्हारे उलझ गए पर मुस्कान बिखरने देती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम। जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम, छोड़ गई थी कभी हमें बस नयनों को छलका देती, लो मान लिया मजबूरी थी बस बालों को लहरा देती, मिले दोबारा किस्मत से बस मन की बात समझती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम।   --©अभिषेक

सफर लम्बा था क्या?

तेरी आँखों में समा जाने से तेरे दिल में उतर जाने का सफ़र लंबा था क्या? वो तुझे छुप छुप कर निहारने से अपने हाथों से सवारने का सफ़र लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई| वो अपने हाथ से तेरे हाथों को मिलाने से हाथों का गालों को छू जाने का सफ़र लम्बा था क्या? मेरे लबों से तेरी बातें निकलने से अब होठों से होठों के मिल जाने का सफर लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई| वो साथ की बातें और बातों में झगड़ों से इश्क के इज़हार का सफ़र लम्बा था क्या? तेरी मुस्कान के ज़िन्दगी बन जाने से मुस्कान के नफरत में बदल जाने का सफ़र लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई| तेरी मोहब्बत में सब कुछ हार जाने से तुझे ही हार जाने तक का सफ़र लम्बा था क्या? तुझसे किये हर वादे को निभाने से खुद को भूल जाने का सफ़र लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई|                                 ------------------------------©अभिषेक