संदेश

poem from heart लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक शाम साथ में गुजारें।

  आओ कुछ पल साथ बैठते हैं, किसी पेड़ की छांव में, किसी नदी के पार से देखते हैं डूबता सूरज, जिसकी किरणें , तुम्हारे चेहरे को चमका रही हैं, आओ एक प्याली चाय लेकर, कुछ पुरानी बातों के संग, उस गुलाबी कुर्ते में जिसमें तुम्हारा सांवला रंग, चाय के रंग को मात दे दे, ना तुमको जाने की जल्दी, ना मुझको रुकने का ग़म हो, चुपचाप ही बैठे रहे, बातें चाहे थोड़ी कम हों, उस शाम को सूरज को, ओझल होने तक निहारें चलो एक शाम साथ में गुजारें। ---अभिषेक  अन्य कविताएं-  आखिर, किसने है।     कोरे पन्ने

मैं तो बस मैं हूँ

मैं तो बस मैं हूँ, न मुझे राह की परवाह है, मुझे न डर, न  सुकून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कौन हो तुम? लड़ता हूँ खुद से, हर हार का हमराही हूँ, मुझे न जीत, न जुनून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया। जो मंज़िल दूर है, तो रहने दो उसे दूर ही मुझसे, न गाड़ी, न पत्थर का मकान चाहिए। जो कहते हैं तुमसे, कि बनो बेहतर हर जगह पर, न उपलब्धि, न ही मुझे नाम चाहिये। हां चुनता हूँ शब्द, क्योंकी न समझाना है खुद को, न लोगों का झूठा यक़ीन चाहिए। कैसे छोड़ दूं हर सीख को, जब भी गिरा हूँ, उठा हूँ, वापस बढ़ा हूँ, मुझे न जीतना है न इनाम चाहिए। मुझसे कहती है मेरी माँ, मुझे तू अफसर जैसा नहीं, बस एक बेहतर इंसान चाहिए। ---©अभिषेक

तुम तो निर्णय कर चुकी।

आज है बस मेरे पास, कल तू कहीं मैं कहीं, सोचता हूँ कह दूं तुझे, पर क्या शब्द वो काम करेंगे, शब्दों में कैसे पिरोऊँ वो बातें, जिन्हें समेटने में सालों लगे, अब सोचता हूँ कह दूं, पर क्या करोगी सुनकर, तुम तो निर्णय कर चुकी हो, सौ बार सोच समझ चुकी हो।                     इसे भी पढ़ें- कौन हो तुम? तुमको मुझसे क्या, मैं तो जैसे हवा का झोंका था, आया और बाल बिखरा गया, सच तो ये है कि मैं कुछ लाया था, हां वही अजीब सी सुगन्ध, जो तुमको उर्जावान करती थी, जो तुमको छूकर महक उठती थी, जो हर बार तुझे झकझोरती थी, तुझसे कहने की कोशिश करती थी, मेरी कहानी, पर तुमको क्या?, तुम तो निर्णय कर चुकी थी। --©अभिषेक

संगी कविता

(1) ठहर जाओ कुछ पल के लिए क्यों टालती हो हर बात कल के लिए, जो पूछता हूँ बस बोल दो क्यों सकुचाती हो पहल के लिए, लो बात जो तुम कहती वो शुरू मैं कर रहा हूँ, तुम हां या न कह दो, मैं तो कब से तुमको सुन रहा हूँ। ----©अभिषेक (2) आ गया हूं  खुद को भी छोड़कर छोड़कर बंधन सारे, सारी रश्में, रश्में जो बांधती थीं मुझको घर से, घर से निकला हूँ यह सोचकर, सोचकर कि तुममे सिमट जाऊंगा जाऊंगा जहाँ तुम साथ हो, हो चाहें जहां या सिर्फ हो आसमां, आसमां ही छत होगी ज़मीन बिस्तर, बिस्तर पर मैं तुझमें सिमट जाऊंगा।  --©अभिषेक

जो मिली दोबारा हमसे तो,

चित्र
जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम, कुछ अपना कहती दर्द और, हाल हमारा सुनती तुम, या चुप रहती बस आंखों को, राज़ उगलने देती तुम, लफ्ज़ तुम्हारे उलझ गए पर मुस्कान बिखरने देती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम। जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम, छोड़ गई थी कभी हमें बस नयनों को छलका देती, लो मान लिया मजबूरी थी बस बालों को लहरा देती, मिले दोबारा किस्मत से बस मन की बात समझती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम।   --©अभिषेक