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कविता संख्या 12(मैंने खुद को बड़ा होते देखा है)

आज मैंने अपने बचपन को मुड़कर देखा है, बचपन के उस भोलेपन को भी देखा है| तब ख़्वाबों की दुनिया बसाई थी मैंने, और छोटे-छोटे ख़्वाबों को मुक्कमल होते देखा है| फिर अपनी नींद से ख़्वाबों को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|                 इसे भी पढ़ें- जवाब नहीं मिलते मुझे अपनी वो ज़िद भी याद है, मैंने नानी को ज़िद पूरा करते देखा है| जब-जब परेशान हुआ हूँ हालातों से, मैंने उनकी गोद का नज़ारा भी देखा है| फिर अपने सर को गोद से अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|                 इसे भी पढ़ें- हम दूर हो जायेंगे मुझे बचपन के आंसुओं की नदियाँ भी याद हैं, हर बात पे अपना पसर जाना भी देखा है| मैं आंसुओं से अपनी बात मनवाता था, इस बात पे माँ बाप का दुलार भी देखा है| फिर अपनी आँखों से आंसुओं को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|          ...

कविता संख्या 11(जवाब नहीं मिलते)

मुझे जब कुछ सवालों के जवाब नहीं मिलते, मैं जानता हूँ कि बेचैन परिंदों को आसमान नहीं मिलते, पर तड़पता हूँ फ़िर भी मैं उस जवाब के लिए, जिस जवाब को लोगों के अल्फ़ाज़ नहीं मिलते। लोग कहते हैं लिखते हो तुम मन की ज़ुबाँ, क्योंकि हम बिखरे हुओं को हमराज़ नहीं मिलते, ज़िन्दगी वीरान है वीरान ही रखूंगा कुछ इस तरह जैसे उफ़नाते समंदर को जहाज़ नहीं मिलते। सब घिरे हुए हैं झूठ फ़रेब और बेईमानी के जालों में, जीवन की इन राहों में सच्चे हमराह नहीं मिलते, सरकी सारी सकल जवानी हालातों से लड़ने में, अक्सर ऐसी जंगों में डंटने वाले जाबांज़ नहीं मिलते। मैं शिद्दत से लिखता हूँ हर भाव निचोड़कर आज़ादी के, क्योंकि शब्दों के इस खेल में लफ्ज़ आज़ाद नहीं मिलते, हालांकि हम ज़रूरतमंदों को ऊंची आवाज़ नहीं मिलती, पर हम लड़ते हैं, सवाल करते हैं, फिर भी जवाब नहीं मिलते।    ----------------------------©अभिषेक

कविता संख्या 10(हम दूर हो जायेंगे)

जब दूरी ना रहेगी बिलकुल, पर हम बहुत दूर हो जायेंगे, सोचा ना था कि खुद ही, इतना मजबूर हो जायेंगे| ना ही समझेंगे, ना ही विचारेंगे, कि तेरी खता क्या थी, हम तेरे इश्क में बदनाम थे, अपनी गजलों में तेरा नाम कर जायेंगे| जब ये चांदनी ना रहेगी निशा में, फिर भी चाँद होगा आसमां में, सोचा ना था ज़िन्दगी में, ये नज़ारे भी देख पायेंगे| ना ही चाहेंगे, ना ही मांगेंगे, तेरी ज़िन्दगी कि खुशियाँ, कभी तेरे नाम का भी खुमार था, ये खुमारी किसी और के नाम कर जायेंगे| जब सांस भी न रहेगी बदन में, फिर भी धड़कन होगी तेरे नाम की, सोचा ना था कि मरकर भी, तेरे दीदार को तड़पते रह जायेंगे| ना ही चहकेंगे, ना ही भागेंगे, तेरे महफ़िल में आ जाने से, कभी शामें होती थी साथ में हमारी, अब तेरी शाम तेरे ही नाम कर जायेंगे|                                      -----------------------------------©अभिषेक

शायरी संग्रह ( मेरी वफ़ा के नगमे )

(1) खाके बेवफाई की ठोकर मन भर गया मोहब्बत से, वरना हम भी थे किसी के आशिक अभी कल की ही बात है| (2) ऐ खुदा, सर भी न दिखे उस बेवफा का, जिसने मेरा दिल दुखाया है| (3) जो पूछते थे छोड़कर तो ना जाओगे, वो आज मुंह मोड़कर जा रहे हैं| (4) सभी की जुबान पर मेरे लिए जिसका नाम है उसे भी खबर नहीं कि मेरी जुबां पर उसी का नाम है| (5) शुक्र है खुदा का कि आँखों का पानी रंगहीन हैं, अगर रंगीन होता तो उनकी बेवफाई का भी निशान होता| (6) हमें तो मोहब्बत ने ऐसे तरसा दिया, जैसे कि पिंजरों में पंछी उन्मुक्त गगन के| (7) दिल में जो अंगारे जलाये बैठे हैं, मुस्कराहट से सबसे छिपाए बैठे हैं| कह ना सके कोई उन्हें बेवफा इसलिए खुद ही बेवफाई किये बैठे हैं| उठना, चलना, और गिर पड़ना, कमजोरी नहीं है| इसे तो हम मोहब्बत का पैमाना बनाये बैठे हैं|                                             ...

कविता संख्या 9 (नाराज़ हूँ)

शायद तू जानती है कि मैं तुझसे नाराज़ हूँ, तो तुझसे कुछ दिन तक बोलूँगा भी नहीं। ख्वाहिश थी, तेरी गली से गुजरूं, तू छत से निहारे, अब जो गुज़रा तो मुड़ के तुझे देखूंगा भी नहीं। कभी तेरी खुशबू की हमें दिल से आस थी, अब जो तू हवा में महके तो सांस लूंगा भी नहीं। नहीं लूंगा मैं सांस मगर तू जानती है कि अपनी हर सांस में बस तेरा नाम लूंगा यूँही। शायद तुझे मालूम है कि मैं तुझसे नाराज़ हूँ, तो तुझसे कुछ दिन तक बोलूँगा भी नहीं। तेरी पदचाप से चौकन्ना हो जाता था जो बदन, अब तेरे आसपास होने पे भी ये थिरकेगा नहीं। स्वप्न है सवेरे सिरहाने तू होगी तो बन जायेगा दिन, जो ख्वाब ये मुक्कमल हुआ तो आंख मैं खोलूँगा भी नहीं। नहीं खोलूँगा आंख निर्णय है मेरा पर तुझे पता है, बन्द आंखों में भी तेरा रूप देखूंगा यूँही। शायद तुझे मालूम है कि मैं तुझसे नाराज़ हूँ। बस मेरे हाथ पे हाथ रख मुस्करा दे अभी, आज के बाद फिर ना रूठूँगा मैं कभी।                 --------------©अभिषेक

कविता संख्या 8

कौन कहता है कि लड़कियां बस सड़कों पे नोची जाती हैं, कुछ तो झूठे प्यार में भी धोखे खाती हैं। बंद कमरे में लुट रही इज़्ज़त उनकी, कभी किसी गैर को बयां भी नहीं कर पाती हैं। हाथों पे कुछ निशान जो घर कर लेते हैं, उनको फटे हुए कपडों से छुपाती हैं। उनकी लुटी इज़्ज़त, उनकी खुद की गलती कहलाती है, समाज में वो वैश्या जो कहलाती हैं। कौन कहता है आबरू खरीदी नहीं जाती, कुछ लड़कियाँ आज भी पैसे देकर नोची जाती हैं।             ----------------©अनामिका

लेख संख्या 2(हमें तो बस इंसाफ चाहिए)

हाँ बिल्कुल हमें इंसाफ़ चाहिए, इंसाफ़ चाहिए क्योंकि किसी विशेष धर्म से सम्बंध रखने वाले ने किसी दूसरे धर्म से संबंधित व्यक्ति के साथ गलत किया है। अभी जो बीते दिनों घटित हुआ उ...

कविता संख्या 7( मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा )

ना मैं दशरथ का बेटा हूँ, न कान्हा सा बन पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना कर्ण के जैसा मित्र हूँ मैं, न तेरा राँझा बन पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं  तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना मैं ख़त की प्यारी वाणी हूँ, न प्रेमगीत बन पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना फूल हूँ तेरी माला का, न तेरी पायल का घुंघरू बन पाऊंगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना उपहार हैं तुझको देने को, न सिनेमा देखने जा पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| ना राज़ बता तू मुझको कोई, मैं हमराज़ नहीं बन पाउँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा| मैं व्यक्ति हूँ स्वनिर्मित आदर्शो का, इसी पथ पे चलता जाऊँगा, माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा|                                        ...

कविता संख्या 6

मैं बोलूँगा अब ये, जब कोई मुझसे पूछेगा कि और भाई क्या चल रहा है? आज कल इस देश में बच्चियों से दुष्कर्म चल रहा है, अपने और पराये सभी के दिल में फरेब पल रहा है| किसे पता कौन उसके साथ है, और कौन-कौन विपरीत चल रहा है| सूर्य उग रहा है पश्चिम से अब, मानव मानवता को जो भूल रहा है| कभी बनाया इसे धर्म गुरु अब, काली करतूतों का गृह ये बन रहा है| न कोई रिश्ते नातों का मान है अब, बस वहशीपन ही एक नाम बचा है| था कभी नैतिकता का सरताज जगत में, अब नैतिक पथ पर पंगु बना है|   तो भाई इत्ता कुछ चल रहा है|                                                -----------------------©अभिषेक

कविता संख्या 5 (05/03/2018)

 (1) हर बार निकलता हूँ खाली, जब-जब खुद में खुद को खोजा है| हर बार मिली है हार मुझे, अबकी जीतूँगा जब-जब सोचा है| हर बार घिरा हूँ उलझन मे, सुलझाते-सुलझाते मन भी उलझा है| हर बार मिला है दर्द मुझे, फिर भी कहता हूँ सब कुछ अच्छा है| (2) क्यूँ बताऊँ तुम्हें कि मेरी उलझनों के राज़ क्या हैं? मेरे जीवन कि उक्त पहेलियों के अलफ़ाज़ क्या हैं? शब्द बता भी दूँ तुम्हे पर तुम क्या जानो, प्रत्येक वर्ण की भावनाओं के अंदाज़ क्या हैं? एक अबूझ सा प्रश्न बनकर रह गया हूँ, किसे पता इसके हल का आगाज़ क्या है? मैंने सुनी हैं सभी की कर्कश ध्वनियाँ, उन्हें भी क्या पता सुरीली आवाज़ क्या है?                                                             ---------------------------©अभिषेक

लेख संख्या 1 (हाँ, मैं सीढ़ी हूँ|)

बिलकुल सही पढ़ा आप ने कि मैं सीढ़ी हूँ, वैसे तो मैं एक इंसान हूँ जीता जागता इंसान, पर लोगों के लिए मैं एक सीढ़ी से बढ़कर नहीं हूँ| मैं अपने कुछ या कह लो अधिकतर मिलने वालो के लिए सीढ़ी हूँ क्योंकि उनके मेरे उपयोग का ढंग ही कुछ ऐसा है| मुझे इस बात से कोई परेशानी नहीं कि वो मुझे क्या समझते हैं पर मैं सिर्फ सीढ़ी ही तो नहीं हूँ ना| कई कारण हैं कि मैं एक आदर्श सीढ़ी हूँ क्योकि मैं सभी के लिए कुछ अधिक ही उपलब्ध रहता हूँ| मैं यहाँ पर उन लोगों को बिलकुल भी खराब नहीं कह सकता जो मेरा उपयोग करते हैं बल्कि उनसे अच्छा कोई नहीं हो सकता| यदि वे मेरा उपयोग नहीं करेंगे तो मेरा इस संसार में होने या ना होने का क्या मतलब? मुझे ख़ुशी होती जब कोई मेरा उपयोग करता है| पर अब क्योकि मैं इंसान भी हूँ तो बदले में मुझे उनसे कुछ आशा होती है जैसे- किसी की सच्ची मित्रता की, कभी बदले में सहायता की, कभी प्रेम की, तो कभी किसी के ध्यान की| बस इन्हीं बातो को ध्यान में रखकर लगातार मैं अपना काम करता रहता हूँ| मुझे अधिकतर ऐसे लोग मिलते हैं जो मुझे मेरी वांछित इक्षाओं का लालच देकर मुझे उपयोग कर लेते हैं, मैं ऐसे लोगों का ऋणी हूँ ...

कविता संख्या 4(10/03/2018)

जब-जब अपने दर्द लिखता हूँ, कलम भी रो पडती है नीले आंसू , कागज़ भी नीलिमा में भीग जाता है| बस एक वही नहीं पिघलता, जिसके दिल को कभी मोम कहा था, शायद अब मोम पत्थर हो गया है, या किसी और का गुलाबी पर्दा, उसकी आँखों में पड़ गया है| ऐसा लगता है कि उसने मुझे नहीं समझा, पर शायद मैंने ही उसे गलत समझा| वैसे हमने सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं. गलतियाँ कुछ उनकी तो कई हमारी भी थीं| उसकी वो यादें, वो मासूम बातें,  और मेरे किये वो सारे वादे, टूटकर कांच की तरह बिखरे हुए हैं| उन्हें मत छुओ, अगर चाहते हो, तो बस उन हजारों टुकड़ों में, मेरे दुःख के सारे रूप समझ लो| वैसे रखना था इस एहसास को अपने अन्दर ही, पर इसे जताना भी बहुत ज़रूरी था | हाँ वो नहीं है जिससे बांटना चाहा, पर बाँट रहा हूँ अपने इन्ही कागज़ कलम के साथ|                                              ...

कविता संख्या 3(20/03/2018)

चीथड़े-चीथड़े हो गयाहूँ, फिर भी समुक्ख साबुत बैठा हूँ| चीत्कार उठी है अंतर मन में, बस होठों को सिये बैठा हूँ| शिकायत शिकवे करूँ किससे आखिर, सबको जो अपना माने बैठा हूँ| टूट चुकी हैं नींदें अब, पर नाजायज़ ख्वाब सजाये बैठा हूँ| गुरूर करूँ तो किसपे आखिर, मैं सबकुछ तो हारा बैठा हूँ|  क्या पता किसी को मेरे दर्द का,  मैं भी तो चेहरे पे मुस्कान लिए बैठा हूँ| मत करो कोशिश मुझे समझने की, मैं टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरा बैठा हूँ|                                                            -------------------©अभिषेक

कविता संख्या 2 (13/04/2018)

आज मैं तुमसे बहुत दूर हूँ, बेचैनी और दर्द से सराबोर हूँ, जो कि तुमसे मिलने की तड़प का है, और तेरे लिए अपनों से हुई झड़प का है| अब मन नहीं है मेरी काया में, वो तेरे पास ही आया होगा, मैंने उसे जो भी समझाया है, वो सब उसने तुम्हे बताया होगा| बेशक लफ्ज़ नहीं हैं उसके पास पर, तुम तो खामोशियाँ पढ़ लेते हो, आशिक हो ना मेरे तुम, मैं न सही मेरी खुशबू ही छू लेते हो| जी रहे हो मेरे बिना तुम, कवि हो क्या मुझे कल्पनाओ में मिल लेते हो|                                                       --------------------©️अभिषेक

कविता संख्या 1(23/03/2018)

 आज फिर से मैं, मैं से हम हो गया,  तेरी बातों के मरहम से, दर्द तो कम हो गया|  पर आग अभी बाकी है दिल में इतनी कि, मैं सूखी लकड़ी था और अब कलम हो गया| पहले था शब्द बिखरे हुए शराबी के, तेरी बातों से दिलकश नज़्म हो गया| आज फिर से मैं, मैं से हम हो गया| सबसे कहता हूँ तेरी मेरी कहानियां, पहले शर्माता था, अब बेशर्म हो गया|  मन की बात तुम्हे बताने से क्या मिला, तुमने तो कह दिया कि मुझे भ्रम हो गया| कभी-कभी पिया करता था जाम-ए-हालात, अब मदहोशी रोज़ का आलम हो गया| सुन लीं आज तूने मेरी सारी मन की बातें तो, आज ओहिर से मैं, मैं से हम  हो गया|                                                                   --------------©️ अभिषेक