कविता संख्या 12(मैंने खुद को बड़ा होते देखा है)
आज मैंने अपने बचपन को मुड़कर देखा है, बचपन के उस भोलेपन को भी देखा है| तब ख़्वाबों की दुनिया बसाई थी मैंने, और छोटे-छोटे ख़्वाबों को मुक्कमल होते देखा है| फिर अपनी नींद से ख़्वाबों को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है| इसे भी पढ़ें- जवाब नहीं मिलते मुझे अपनी वो ज़िद भी याद है, मैंने नानी को ज़िद पूरा करते देखा है| जब-जब परेशान हुआ हूँ हालातों से, मैंने उनकी गोद का नज़ारा भी देखा है| फिर अपने सर को गोद से अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है| इसे भी पढ़ें- हम दूर हो जायेंगे मुझे बचपन के आंसुओं की नदियाँ भी याद हैं, हर बात पे अपना पसर जाना भी देखा है| मैं आंसुओं से अपनी बात मनवाता था, इस बात पे माँ बाप का दुलार भी देखा है| फिर अपनी आँखों से आंसुओं को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है| ...