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संगी कविता

(1) ठहर जाओ कुछ पल के लिए क्यों टालती हो हर बात कल के लिए, जो पूछता हूँ बस बोल दो क्यों सकुचाती हो पहल के लिए, लो बात जो तुम कहती वो शुरू मैं कर रहा हूँ, तुम हां या न कह दो, मैं तो कब से तुमको सुन रहा हूँ। ----©अभिषेक (2) आ गया हूं  खुद को भी छोड़कर छोड़कर बंधन सारे, सारी रश्में, रश्में जो बांधती थीं मुझको घर से, घर से निकला हूँ यह सोचकर, सोचकर कि तुममे सिमट जाऊंगा जाऊंगा जहाँ तुम साथ हो, हो चाहें जहां या सिर्फ हो आसमां, आसमां ही छत होगी ज़मीन बिस्तर, बिस्तर पर मैं तुझमें सिमट जाऊंगा।  --©अभिषेक

अब जब चाय बने तब,

जब पानी में शक्कर घुले तब आना तुम, जब चाय की लाली चढ़े तब आना तुम, एक अदरक सी कड़क बात बोलेंगे, सारे उलझे हुए रिश्ते के तार खोलेंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम। खुशबू मिले इलायची की तब आना तुम, दूध पर गेहुंआ रंग चढ़े तब आना तुम, छन्नी सी बातों से कड़वाहट हटाएंगे, पकड़ के सहारे रिश्ते कप बनाएंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम।  ----©अभिषेक

जो मिली दोबारा हमसे तो,

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जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम, कुछ अपना कहती दर्द और, हाल हमारा सुनती तुम, या चुप रहती बस आंखों को, राज़ उगलने देती तुम, लफ्ज़ तुम्हारे उलझ गए पर मुस्कान बिखरने देती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम। जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम, छोड़ गई थी कभी हमें बस नयनों को छलका देती, लो मान लिया मजबूरी थी बस बालों को लहरा देती, मिले दोबारा किस्मत से बस मन की बात समझती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम।   --©अभिषेक