संगी कविता
(1) ठहर जाओ कुछ पल के लिए क्यों टालती हो हर बात कल के लिए, जो पूछता हूँ बस बोल दो क्यों सकुचाती हो पहल के लिए, लो बात जो तुम कहती वो शुरू मैं कर रहा हूँ, तुम हां या न कह दो, मैं तो कब से तुमको सुन रहा हूँ। ----©अभिषेक (2) आ गया हूं खुद को भी छोड़कर छोड़कर बंधन सारे, सारी रश्में, रश्में जो बांधती थीं मुझको घर से, घर से निकला हूँ यह सोचकर, सोचकर कि तुममे सिमट जाऊंगा जाऊंगा जहाँ तुम साथ हो, हो चाहें जहां या सिर्फ हो आसमां, आसमां ही छत होगी ज़मीन बिस्तर, बिस्तर पर मैं तुझमें सिमट जाऊंगा। --©अभिषेक