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कविता संख्या 13 (बेटियां बोझ नहीं होती)

        इसे भी पढ़ें- कविता संख्या 8                           जवाब नहीं मिलते बचपन में प्यार की थपकी दी थी, आज फिर से गले लगाओ न पापा| हाथ पकड़ के चलना सिखाया, आज गिरने से बचा लो न पापा| लोरी सुना के सपने दिखाए, आज उन्हें पूरा करने से न रोको पापा| हर गम से दूर रखा था मुझे, आज ज़ख्मों पे नमक न डालो पापा| दुनिया की सारी ख़ुशी क़दमों में रखी थी, आज दर्द दे कर न रुलाओ पापा| ऊँचा उड़ने की सीख सिखाकर, आज उड़ने से तो न रोको पापा| मेरी हर ख्वाहिश  को पूरा किया है, आज उसे मेरा बना दो न पापा| एक गलती हो गयी मुझसे, उसकी यूँ सजा तो न दो पापा| माना बेटी हूँआपकी, एक बार बेटा बनाके गले लगाओ न पापा| आपकी मुस्कान अच्छी है, बस मेरे लिए एक बार, मेरे लिए मुस्कराओ न पापा| दुनिया बहुत मतलबी है, मुझे अपने साए में छुपाओ न पापा| सबने अकेले छोड़ दिया है, आप तो मुंह मोड़कर न जाओ पापा|     एक दिन तो मुझे जाना ही है, कुछ दिन तो साथ बिठाओ न पापा|  बहुत तडपी ह...