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एक शाम साथ में गुजारें।

  आओ कुछ पल साथ बैठते हैं, किसी पेड़ की छांव में, किसी नदी के पार से देखते हैं डूबता सूरज, जिसकी किरणें , तुम्हारे चेहरे को चमका रही हैं, आओ एक प्याली चाय लेकर, कुछ पुरानी बातों के संग, उस गुलाबी कुर्ते में जिसमें तुम्हारा सांवला रंग, चाय के रंग को मात दे दे, ना तुमको जाने की जल्दी, ना मुझको रुकने का ग़म हो, चुपचाप ही बैठे रहे, बातें चाहे थोड़ी कम हों, उस शाम को सूरज को, ओझल होने तक निहारें चलो एक शाम साथ में गुजारें। ---अभिषेक  अन्य कविताएं-  आखिर, किसने है।     कोरे पन्ने

कोरे पन्ने

आज फिर कुछ खाली पन्ने लेकर बैठा हूँ, बिल्कुल कोरे बिल्कुल खरे, बिल्कुल मेरे बालमन जैसे, वैसे जैसे कॉपी की शुरुआत में होते हैं। बिल्कुल साफ बिल्कुल सुंदर, बिल्कुल मेरे बालकर्म जैसे, वैसे जैसे कॉपी की पहली लिखावट होती है। कुछ नीला कुछ काला रंग, बिल्कुल खट्टी मीठी यादों जैसे, वैसा जैसा बिल्कुल पहला पाठ होता है। पर ये तो 20 वां पाठ है, अब तक जाने कितने पन्ने रंग डाले, कुछ सुंदर कुछ गड़बड़ से, कुछ बिल्कुल बदसूरत से, वैसे जैसे कॉपी का आखिरी पन्ना होता है। पर फिर नया पाठ शुरू होता है, नई कॉपी शुरू होती है, वैसे जैसे फिर से नया दिन शुरू होता है। अब वो कोरे पन्ने मेरे हैं, अब मैं समझदार हूँ, वैसे जैसे किताबों के लेखक होते हैं। अब इन पन्नों पर सुंदर लिखना है, बिल्कुल पहले पन्ने जैसा हर पन्ना, वैसे जैसे लेखक किताब लिखते हैं। पर वादा है फिर गलती होगी, फिर कहीं न कहीं गड़बड़ होगी, वैसे जैसे डायरी पर विचारों को काट देता हूँ। क्योंकि पन्ने मेरे हैं, विचार मेरे हैं, जो करना है अब अपने अंदाज़ में करता हूँ।  ---©अभिषेक  इन्हें भी पढ़ें- कौन हो तुम? मैं त...

अब जब चाय बने तब,

जब पानी में शक्कर घुले तब आना तुम, जब चाय की लाली चढ़े तब आना तुम, एक अदरक सी कड़क बात बोलेंगे, सारे उलझे हुए रिश्ते के तार खोलेंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम। खुशबू मिले इलायची की तब आना तुम, दूध पर गेहुंआ रंग चढ़े तब आना तुम, छन्नी सी बातों से कड़वाहट हटाएंगे, पकड़ के सहारे रिश्ते कप बनाएंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम।  ----©अभिषेक