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कोरे पन्ने

आज फिर कुछ खाली पन्ने लेकर बैठा हूँ, बिल्कुल कोरे बिल्कुल खरे, बिल्कुल मेरे बालमन जैसे, वैसे जैसे कॉपी की शुरुआत में होते हैं। बिल्कुल साफ बिल्कुल सुंदर, बिल्कुल मेरे बालकर्म जैसे, वैसे जैसे कॉपी की पहली लिखावट होती है। कुछ नीला कुछ काला रंग, बिल्कुल खट्टी मीठी यादों जैसे, वैसा जैसा बिल्कुल पहला पाठ होता है। पर ये तो 20 वां पाठ है, अब तक जाने कितने पन्ने रंग डाले, कुछ सुंदर कुछ गड़बड़ से, कुछ बिल्कुल बदसूरत से, वैसे जैसे कॉपी का आखिरी पन्ना होता है। पर फिर नया पाठ शुरू होता है, नई कॉपी शुरू होती है, वैसे जैसे फिर से नया दिन शुरू होता है। अब वो कोरे पन्ने मेरे हैं, अब मैं समझदार हूँ, वैसे जैसे किताबों के लेखक होते हैं। अब इन पन्नों पर सुंदर लिखना है, बिल्कुल पहले पन्ने जैसा हर पन्ना, वैसे जैसे लेखक किताब लिखते हैं। पर वादा है फिर गलती होगी, फिर कहीं न कहीं गड़बड़ होगी, वैसे जैसे डायरी पर विचारों को काट देता हूँ। क्योंकि पन्ने मेरे हैं, विचार मेरे हैं, जो करना है अब अपने अंदाज़ में करता हूँ।  ---©अभिषेक  इन्हें भी पढ़ें- कौन हो तुम? मैं त...

मैं तो बस मैं हूँ

मैं तो बस मैं हूँ, न मुझे राह की परवाह है, मुझे न डर, न  सुकून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कौन हो तुम? लड़ता हूँ खुद से, हर हार का हमराही हूँ, मुझे न जीत, न जुनून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया। जो मंज़िल दूर है, तो रहने दो उसे दूर ही मुझसे, न गाड़ी, न पत्थर का मकान चाहिए। जो कहते हैं तुमसे, कि बनो बेहतर हर जगह पर, न उपलब्धि, न ही मुझे नाम चाहिये। हां चुनता हूँ शब्द, क्योंकी न समझाना है खुद को, न लोगों का झूठा यक़ीन चाहिए। कैसे छोड़ दूं हर सीख को, जब भी गिरा हूँ, उठा हूँ, वापस बढ़ा हूँ, मुझे न जीतना है न इनाम चाहिए। मुझसे कहती है मेरी माँ, मुझे तू अफसर जैसा नहीं, बस एक बेहतर इंसान चाहिए। ---©अभिषेक

तुम तो निर्णय कर चुकी।

आज है बस मेरे पास, कल तू कहीं मैं कहीं, सोचता हूँ कह दूं तुझे, पर क्या शब्द वो काम करेंगे, शब्दों में कैसे पिरोऊँ वो बातें, जिन्हें समेटने में सालों लगे, अब सोचता हूँ कह दूं, पर क्या करोगी सुनकर, तुम तो निर्णय कर चुकी हो, सौ बार सोच समझ चुकी हो।                     इसे भी पढ़ें- कौन हो तुम? तुमको मुझसे क्या, मैं तो जैसे हवा का झोंका था, आया और बाल बिखरा गया, सच तो ये है कि मैं कुछ लाया था, हां वही अजीब सी सुगन्ध, जो तुमको उर्जावान करती थी, जो तुमको छूकर महक उठती थी, जो हर बार तुझे झकझोरती थी, तुझसे कहने की कोशिश करती थी, मेरी कहानी, पर तुमको क्या?, तुम तो निर्णय कर चुकी थी। --©अभिषेक