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सावन की बूंदें

 चारू आज बहुत खुश थी , हो भी क्यों ना आखिर आज वह अपने चाचा के साथ शहर रहने जो जा रही थी ꫰ छोटी सी बच्ची अपनी जितनी यादों को समेट पायी समेटती रही ꫰ गांव की माटी ,बाग़ का पीला फूल जिसे वह गेंदवा कहती थी , गुड़िया, माँ की काजल की डिबिया ,बापू की कलम , सहेलियों की चोटी केे फीते सब तो रख लिया उसने फिर उसे ऐसा क्यों लग रहा था कि जैसे वो कुछ भूल रही है , नहीं शायद वो कुछ नहीं भूली ꫰ "चारू" चाचा ने पुकारा तो वह फुदकती हुई चाचा के पास चली गयी ꫰ "चारू चलें ?" , "हाँ चाचा अब मुझे इस गाँव में नहीं रहना ꫰" चारू सुबकती हुई बोली ꫰ वह इस गाँव से नाराज है ꫰ आज के तीन बरस पहले इसी गाँव में बाढ़ की चपेट में आये माँ बाप को उसने खो दिया था ꫰ " ऊपर चढ़ लड़की " चाचा ने टोका ꫰ बड़ी सफेद रंग की गाड़ी पहली बार तो देखी थी उसने꫰ जैसे ही गाड़ी में पहला कदम रखा उसे किसी ने रोका , " रुक चारू "पीछे मुड़कर देखा तो उसकी सहेली नाजिया हाथ में कुछ लिए खड़ी थी ꫰ " ये क्या है री ?", " देखती नहीं तेरे लडडू गोपाल लायी हूँ , जो तेरा हमेशा ख्याल रखते हैं तू उन्हें ही...

लघु कथा 1 ( आखिर टुकड़े हो ही गए )

घर में संग्राम छिड़ा हुआ था माँ और बेटे के बीच, बेटा जो कि अभी यही कोई पंद्रह बरस का होगा अपनी जिद पर अड़ा हुआ था और वो 45 वर्षीय महिला जो कि बेड रेस्ट पर थी अपनी जिद पे अटल थीं | बड़ा लड़का अपनी धुन में था हालांकि सब कुछ सुन रहा था पर कुछ कह नहीं रहा था |अब जिद कुछ इस बात की थी कि छोटे लड़के ने अनार का जूस निकाला था जो कि मात्र एक ही गिलास निकला था| माँ की जिद थी कि उस एक गिलास में भी तीन हिस्से हों और तीनों लोग मिल कर जूस का सेवन करें, और छोटा लड़का इस बात पे राजी न था उसका कहना था कि अभी आप बीमारी से सही हो रही हो तो आपको इस जूस की ज़रुरत है और वो इस गिलास के और हिस्से न होने देगा| अब माँ कहाँ किसी कि मानने वाली थी उसने बी जिद पकड़ ली की अब तो गिलास के जूस के हिस्से होकर रहेंगे| जब छोटे लड़के को ये लगा की अकेले वो माँ से नहीं जीत सकता तो वो बड़े लड़के के पास गया और कहा कि समझाओ एक तो इत्ता सा जूस है उसमें भी इन्हें तीन भाग करते हैं | बड़ा लड़का बस इतना ही बोला कि वो कुछ नहीं कर सकता है क्योंकि करनी माँ को अपने मन की ही है| शायद बीमार होने पे इंसान कुछ ज्यादा ही जिद्दी हो जाता है| अब ज...