कविता संख्या 3(20/03/2018)

चीथड़े-चीथड़े हो गयाहूँ,
फिर भी समुक्ख साबुत बैठा हूँ|

चीत्कार उठी है अंतर मन में,
बस होठों को सिये बैठा हूँ|

शिकायत शिकवे करूँ किससे आखिर,
सबको जो अपना माने बैठा हूँ|

टूट चुकी हैं नींदें अब,
पर नाजायज़ ख्वाब सजाये बैठा हूँ|

गुरूर करूँ तो किसपे आखिर,
मैं सबकुछ तो हारा बैठा हूँ|

 क्या पता किसी को मेरे दर्द का,
 मैं भी तो चेहरे पे मुस्कान लिए बैठा हूँ|

मत करो कोशिश मुझे समझने की,
मैं टुकड़ों-टुकड़ों में बिखरा बैठा हूँ|
                                                           -------------------©अभिषेक

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