लघु कथा 1 ( आखिर टुकड़े हो ही गए )
घर में संग्राम छिड़ा हुआ था माँ और बेटे के बीच, बेटा जो कि अभी यही कोई
पंद्रह बरस का होगा अपनी जिद पर अड़ा हुआ था और वो 45 वर्षीय महिला जो कि बेड रेस्ट पर थी अपनी जिद पे अटल थीं| बड़ा लड़का अपनी धुन में था हालांकि सब कुछ सुन
रहा था पर कुछ कह नहीं रहा था |अब जिद कुछ इस बात की थी कि छोटे लड़के ने अनार का
जूस निकाला था जो कि मात्र एक ही गिलास निकला था| माँ की जिद थी कि उस एक गिलास
में भी तीन हिस्से हों और तीनों लोग मिल कर जूस का सेवन करें, और छोटा लड़का इस बात
पे राजी न था उसका कहना था कि अभी आप बीमारी से सही हो रही हो तो आपको इस जूस की
ज़रुरत है और वो इस गिलास के और हिस्से न होने देगा| अब माँ कहाँ किसी कि मानने
वाली थी उसने बी जिद पकड़ ली की अब तो गिलास के जूस के हिस्से होकर रहेंगे|
जब छोटे लड़के को ये लगा की अकेले वो माँ से नहीं जीत सकता तो वो बड़े लड़के के पास गया और कहा कि
समझाओ एक तो इत्ता सा जूस है उसमें भी इन्हें तीन भाग करते हैं| बड़ा लड़का बस इतना ही बोला कि वो कुछ नहीं कर
सकता है क्योंकि करनी माँ को अपने मन की ही है| शायद बीमार होने पे इंसान कुछ
ज्यादा ही जिद्दी हो जाता है| अब जब छोटे लड़के को अपनी बात बनती न दिखी तो उसने
अपने पिता जी कोम फ़ोन घुमाने की ठान ली| पूरे गुस्से में माँ को देखते हुए नंबर
मिला रहा था और बीच में धमकी भी दे रहा था कि न मानो अभी पापा से कहते हैं| फ़ोन की घंटी गयी उस तरफ से घर के एकमात्र
पालनहार ने फ़ोन उठाया और अपने छोटे बालक का बयान पूरे ध्यान से सुना फिर उस पिता
ने बालक को फ़ोन उसकी माँ को देने का आदेश दिया| अब एक पति और पत्नी की बात होने
लगी उनके पुत्र को लेकर अब माँ ने पिता जी को कुछ ऐसा समझाया की देखो कित्ता कमज़ोर
हो गया है अपना छोटा बेटा हमेसः बीमार रहता है इसलिए हम कह रहे थे कि कुछ पौष्टिक
खा लेगा तो शरीर में कुछ जाए| अब पिता जी भी माँ की तरफ हो गये| आखिर छोटा लड़का
अपनी लड़ाई नहीं जीत पाया आखिर उस जूस के टुकडे हो ही गए| अब इस सारी बात में एक
खास बात ये नज़र आई कि आखिर उस बालक ने जिससे शिकायत की उसका उस जूस से क्या
सम्बन्ध था? साफ़ साफ़ कुछ भी नहीं उसे उसकी एक बूँद भी न मिलने वाली थी, फिर भी वो
उस मामले को पूरे ध्यान से सुन रहा था और उसके हल का पूरा प्रयास कर रहा था, शायद
यही होता है परिवार कि बिना अपनी किसी चाह के अपने परिवार की हर चाह पूरी करना, और
ऐसा ही होता है मुखिया जो कि सबकी बात सुनता है फिर सबके हित का सोचता है| एक मुखिया होना आसन नहीं होता है आपको अपनी
इच्छा को किनारे रखकर सबके लिए जीना होता है एक पिता की तरह, पति की तरह, और पुत्र
की तरह कई किरदार बखूबी निभाने का प्रयास करता है, एक मुखिया|
----------------------------------© अभिषेक
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