कविता संख्या 1(23/03/2018)


 आज फिर से मैं, मैं से हम हो गया,
 तेरी बातों के मरहम से, दर्द तो कम हो गया|
 पर आग अभी बाकी है दिल में इतनी कि,
मैं सूखी लकड़ी था और अब कलम हो गया|
पहले था शब्द बिखरे हुए शराबी के,
तेरी बातों से दिलकश नज़्म हो गया|
आज फिर से मैं, मैं से हम हो गया|

सबसे कहता हूँ तेरी मेरी कहानियां,
पहले शर्माता था, अब बेशर्म हो गया|
 मन की बात तुम्हे बताने से क्या मिला,
तुमने तो कह दिया कि मुझे भ्रम हो गया|
कभी-कभी पिया करता था जाम-ए-हालात,
अब मदहोशी रोज़ का आलम हो गया|
सुन लीं आज तूने मेरी सारी मन की बातें तो,
आज ओहिर से मैं, मैं से हम  हो गया|
                                                                  --------------©️ अभिषेक

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