कविता संख्या 11(जवाब नहीं मिलते)
मुझे जब कुछ सवालों के जवाब नहीं मिलते,
मैं जानता हूँ कि बेचैन परिंदों को आसमान नहीं मिलते,
पर तड़पता हूँ फ़िर भी मैं उस जवाब के लिए,
जिस जवाब को लोगों के अल्फ़ाज़ नहीं मिलते।
मैं जानता हूँ कि बेचैन परिंदों को आसमान नहीं मिलते,
पर तड़पता हूँ फ़िर भी मैं उस जवाब के लिए,
जिस जवाब को लोगों के अल्फ़ाज़ नहीं मिलते।
लोग कहते हैं लिखते हो तुम मन की ज़ुबाँ,
क्योंकि हम बिखरे हुओं को हमराज़ नहीं मिलते,
ज़िन्दगी वीरान है वीरान ही रखूंगा कुछ इस तरह
जैसे उफ़नाते समंदर को जहाज़ नहीं मिलते।
क्योंकि हम बिखरे हुओं को हमराज़ नहीं मिलते,
ज़िन्दगी वीरान है वीरान ही रखूंगा कुछ इस तरह
जैसे उफ़नाते समंदर को जहाज़ नहीं मिलते।
सब घिरे हुए हैं झूठ फ़रेब और बेईमानी के जालों में,
जीवन की इन राहों में सच्चे हमराह नहीं मिलते,
सरकी सारी सकल जवानी हालातों से लड़ने में,
अक्सर ऐसी जंगों में डंटने वाले जाबांज़ नहीं मिलते।
जीवन की इन राहों में सच्चे हमराह नहीं मिलते,
सरकी सारी सकल जवानी हालातों से लड़ने में,
अक्सर ऐसी जंगों में डंटने वाले जाबांज़ नहीं मिलते।
मैं शिद्दत से लिखता हूँ हर भाव निचोड़कर आज़ादी के,
क्योंकि शब्दों के इस खेल में लफ्ज़ आज़ाद नहीं मिलते,
हालांकि हम ज़रूरतमंदों को ऊंची आवाज़ नहीं मिलती,
पर हम लड़ते हैं, सवाल करते हैं, फिर भी जवाब नहीं मिलते।
----------------------------©अभिषेक
क्योंकि शब्दों के इस खेल में लफ्ज़ आज़ाद नहीं मिलते,
हालांकि हम ज़रूरतमंदों को ऊंची आवाज़ नहीं मिलती,
पर हम लड़ते हैं, सवाल करते हैं, फिर भी जवाब नहीं मिलते।
----------------------------©अभिषेक
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