कविता संख्या 12(मैंने खुद को बड़ा होते देखा है)
आज मैंने अपने बचपन को मुड़कर देखा है,
बचपन के उस भोलेपन को भी देखा है|
तब ख़्वाबों की दुनिया बसाई थी मैंने,
और छोटे-छोटे ख़्वाबों को मुक्कमल होते देखा है|
फिर अपनी नींद से ख़्वाबों को अलग होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|
इसे भी पढ़ें-जवाब नहीं मिलते
मुझे अपनी वो ज़िद भी याद है,
मैंने नानी को ज़िद पूरा करते देखा है|
जब-जब परेशान हुआ हूँ हालातों से,
मैंने उनकी गोद का नज़ारा भी देखा है|
फिर अपने सर को गोद से अलग होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|
इसे भी पढ़ें-हम दूर हो जायेंगे
मुझे बचपन के आंसुओं की नदियाँ भी याद हैं,
हर बात पे अपना पसर जाना भी देखा है|
मैं आंसुओं से अपनी बात मनवाता था,
इस बात पे माँ बाप का दुलार भी देखा है|
फिर अपनी आँखों से आंसुओं को अलग होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|
इसे भी पढ़ें-मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा
मुझे वो रोज़ स्कूल जाना भी याद है,
मैंने दोस्तों से हर बात पे लड़ जाना भी देखा है|
मुझे अगले दिन साथ बैठने की जिद भी याद है,
पढाई के साथ अपना हँसना हँसाना भी देखा है|
फिर अपनी पीठ से बैग को अलग होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होता देखा है|
इसे भी पढ़ें-हमें तो बस इन्साफ चाहिए
याद है वो शाम में गलियों का खेल,
मैंने उन खेलों में खुद को बेईमान होते देखा है|
हारा हूँ उन खेलों में भी बेतहासा,
खेल में हार कर भी खुद को जीतते देखा है|
फिर जवानी के आते बचपन ख़त्म होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|
---------------------------------©अभिषेक
अगर आपने अपने किसी दोस्त के साथ ऐसे पलों का अनुभव लिया हो तो उसे शेयर करें|
बचपन के उस भोलेपन को भी देखा है|
तब ख़्वाबों की दुनिया बसाई थी मैंने,
और छोटे-छोटे ख़्वाबों को मुक्कमल होते देखा है|
फिर अपनी नींद से ख़्वाबों को अलग होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|
इसे भी पढ़ें-जवाब नहीं मिलते
मुझे अपनी वो ज़िद भी याद है,
मैंने नानी को ज़िद पूरा करते देखा है|
जब-जब परेशान हुआ हूँ हालातों से,
मैंने उनकी गोद का नज़ारा भी देखा है|
फिर अपने सर को गोद से अलग होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|
इसे भी पढ़ें-हम दूर हो जायेंगे
मुझे बचपन के आंसुओं की नदियाँ भी याद हैं,
हर बात पे अपना पसर जाना भी देखा है|
मैं आंसुओं से अपनी बात मनवाता था,
इस बात पे माँ बाप का दुलार भी देखा है|
फिर अपनी आँखों से आंसुओं को अलग होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|
इसे भी पढ़ें-मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा
मुझे वो रोज़ स्कूल जाना भी याद है,
मैंने दोस्तों से हर बात पे लड़ जाना भी देखा है|
मुझे अगले दिन साथ बैठने की जिद भी याद है,
पढाई के साथ अपना हँसना हँसाना भी देखा है|
फिर अपनी पीठ से बैग को अलग होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होता देखा है|
इसे भी पढ़ें-हमें तो बस इन्साफ चाहिए
याद है वो शाम में गलियों का खेल,
मैंने उन खेलों में खुद को बेईमान होते देखा है|
हारा हूँ उन खेलों में भी बेतहासा,
खेल में हार कर भी खुद को जीतते देखा है|
फिर जवानी के आते बचपन ख़त्म होते देखा है,
हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|
---------------------------------©अभिषेक
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