कविता संख्या 2 (13/04/2018)
आज मैं तुमसे बहुत दूर हूँ,
बेचैनी और दर्द से सराबोर हूँ,
जो कि तुमसे मिलने की तड़प का है,
और तेरे लिए अपनों से हुई झड़प का है|
अब मन नहीं है मेरी काया में,
वो तेरे पास ही आया होगा,
मैंने उसे जो भी समझाया है,
वो सब उसने तुम्हे बताया होगा|
बेशक लफ्ज़ नहीं हैं उसके पास पर,
तुम तो खामोशियाँ पढ़ लेते हो,
आशिक हो ना मेरे तुम, मैं न सही
मेरी खुशबू ही छू लेते हो|
जी रहे हो मेरे बिना तुम, कवि हो
क्या मुझे कल्पनाओ में मिल लेते हो|
--------------------©️अभिषेक
बेचैनी और दर्द से सराबोर हूँ,
जो कि तुमसे मिलने की तड़प का है,
और तेरे लिए अपनों से हुई झड़प का है|
अब मन नहीं है मेरी काया में,
वो तेरे पास ही आया होगा,
मैंने उसे जो भी समझाया है,
वो सब उसने तुम्हे बताया होगा|
बेशक लफ्ज़ नहीं हैं उसके पास पर,
तुम तो खामोशियाँ पढ़ लेते हो,
आशिक हो ना मेरे तुम, मैं न सही
मेरी खुशबू ही छू लेते हो|
जी रहे हो मेरे बिना तुम, कवि हो
क्या मुझे कल्पनाओ में मिल लेते हो|
--------------------©️अभिषेक
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