कविता संख्या 4(10/03/2018)
जब-जब अपने दर्द लिखता हूँ,
कलम भी रो पडती है नीले आंसू ,
कागज़ भी नीलिमा में भीग जाता है|
बस एक वही नहीं पिघलता,
जिसके दिल को कभी मोम कहा था,
शायद अब मोम पत्थर हो गया है,
या किसी और का गुलाबी पर्दा,
उसकी आँखों में पड़ गया है|
ऐसा लगता है कि उसने मुझे नहीं समझा,
पर शायद मैंने ही उसे गलत समझा|
वैसे हमने सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं.
गलतियाँ कुछ उनकी तो कई हमारी भी थीं|
उसकी वो यादें, वो मासूम बातें,
और मेरे किये वो सारे वादे,
टूटकर कांच की तरह बिखरे हुए हैं|
उन्हें मत छुओ, अगर चाहते हो,
तो बस उन हजारों टुकड़ों में,
मेरे दुःख के सारे रूप समझ लो|
वैसे रखना था इस एहसास को अपने अन्दर ही,
पर इसे जताना भी बहुत ज़रूरी था |
हाँ वो नहीं है जिससे बांटना चाहा,
पर बाँट रहा हूँ अपने इन्ही कागज़ कलम के साथ|
-----------------©अभिषेक
कलम भी रो पडती है नीले आंसू ,
कागज़ भी नीलिमा में भीग जाता है|
बस एक वही नहीं पिघलता,
जिसके दिल को कभी मोम कहा था,
शायद अब मोम पत्थर हो गया है,
या किसी और का गुलाबी पर्दा,
उसकी आँखों में पड़ गया है|
ऐसा लगता है कि उसने मुझे नहीं समझा,
पर शायद मैंने ही उसे गलत समझा|
वैसे हमने सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं.
गलतियाँ कुछ उनकी तो कई हमारी भी थीं|
उसकी वो यादें, वो मासूम बातें,
और मेरे किये वो सारे वादे,
टूटकर कांच की तरह बिखरे हुए हैं|
उन्हें मत छुओ, अगर चाहते हो,
तो बस उन हजारों टुकड़ों में,
मेरे दुःख के सारे रूप समझ लो|
वैसे रखना था इस एहसास को अपने अन्दर ही,
पर इसे जताना भी बहुत ज़रूरी था |
हाँ वो नहीं है जिससे बांटना चाहा,
पर बाँट रहा हूँ अपने इन्ही कागज़ कलम के साथ|
-----------------©अभिषेक
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