कविता संख्या 5 (05/03/2018)

 (1)
हर बार निकलता हूँ खाली,
जब-जब खुद में खुद को खोजा है|
हर बार मिली है हार मुझे,
अबकी जीतूँगा जब-जब सोचा है|
हर बार घिरा हूँ उलझन मे,
सुलझाते-सुलझाते मन भी उलझा है|
हर बार मिला है दर्द मुझे,
फिर भी कहता हूँ सब कुछ अच्छा है|

(2)
क्यूँ बताऊँ तुम्हें कि मेरी उलझनों के राज़ क्या हैं?
मेरे जीवन कि उक्त पहेलियों के अलफ़ाज़ क्या हैं?
शब्द बता भी दूँ तुम्हे पर तुम क्या जानो,
प्रत्येक वर्ण की भावनाओं के अंदाज़ क्या हैं?
एक अबूझ सा प्रश्न बनकर रह गया हूँ,
किसे पता इसके हल का आगाज़ क्या है?
मैंने सुनी हैं सभी की कर्कश ध्वनियाँ,
उन्हें भी क्या पता सुरीली आवाज़ क्या है?
                                                            ---------------------------©अभिषेक

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