कविता संख्या 6

मैं बोलूँगा अब ये, जब कोई मुझसे पूछेगा
कि और भाई क्या चल रहा है?
आज कल इस देश में बच्चियों से दुष्कर्म चल रहा है,
अपने और पराये सभी के दिल में फरेब पल रहा है|
किसे पता कौन उसके साथ है,
और कौन-कौन विपरीत चल रहा है|

सूर्य उग रहा है पश्चिम से अब,
मानव मानवता को जो भूल रहा है|
कभी बनाया इसे धर्म गुरु अब,
काली करतूतों का गृह ये बन रहा है|
न कोई रिश्ते नातों का मान है अब,
बस वहशीपन ही एक नाम बचा है|

था कभी नैतिकता का सरताज जगत में,
अब नैतिक पथ पर पंगु बना है| 
 तो भाई इत्ता कुछ चल रहा है|
                                               -----------------------©अभिषेक

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