कविता संख्या 7( मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा )

ना मैं दशरथ का बेटा हूँ, न कान्हा सा बन पाउँगा,
माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा|

ना कर्ण के जैसा मित्र हूँ मैं, न तेरा राँझा बन पाउँगा,
माफ़ करना तुम मुझको मैं  तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा|

ना मैं ख़त की प्यारी वाणी हूँ, न प्रेमगीत बन पाउँगा,
माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा|

ना फूल हूँ तेरी माला का, न तेरी पायल का घुंघरू बन पाऊंगा,
माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा|

ना उपहार हैं तुझको देने को, न सिनेमा देखने जा पाउँगा,
माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा|

ना राज़ बता तू मुझको कोई, मैं हमराज़ नहीं बन पाउँगा,
माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा|

मैं व्यक्ति हूँ स्वनिर्मित आदर्शो का, इसी पथ पे चलता जाऊँगा,
माफ़ करना तुम मुझको मैं तुमको प्यार नहीं दे पाउँगा|
                                                                         ------------------------©अभिषेक

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सावन की बूंदें

कविता संख्या 3(20/03/2018)

लघु कथा 3( कर्म लौटकर आया)