कविता संख्या 8

कौन कहता है कि लड़कियां बस
सड़कों पे नोची जाती हैं,
कुछ तो झूठे प्यार में भी
धोखे खाती हैं।
बंद कमरे में लुट रही
इज़्ज़त उनकी,
कभी किसी गैर को
बयां भी नहीं कर पाती हैं।
हाथों पे कुछ निशान
जो घर कर लेते हैं,
उनको फटे हुए कपडों से
छुपाती हैं।
उनकी लुटी इज़्ज़त, उनकी
खुद की गलती कहलाती है,
समाज में वो वैश्या जो
कहलाती हैं।
कौन कहता है आबरू
खरीदी नहीं जाती,
कुछ लड़कियाँ आज भी
पैसे देकर नोची जाती हैं।
            ----------------©अनामिका

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सावन की बूंदें

कविता संख्या 3(20/03/2018)

लघु कथा 3( कर्म लौटकर आया)