कविता संख्या 9 (नाराज़ हूँ)
शायद तू जानती है कि मैं तुझसे नाराज़ हूँ,
तो तुझसे कुछ दिन तक बोलूँगा भी नहीं।
ख्वाहिश थी, तेरी गली से गुजरूं, तू छत से निहारे,
अब जो गुज़रा तो मुड़ के तुझे देखूंगा भी नहीं।
कभी तेरी खुशबू की हमें दिल से आस थी,
अब जो तू हवा में महके तो सांस लूंगा भी नहीं।
नहीं लूंगा मैं सांस मगर तू जानती है कि
अपनी हर सांस में बस तेरा नाम लूंगा यूँही।
शायद तुझे मालूम है कि मैं तुझसे नाराज़ हूँ,
तो तुझसे कुछ दिन तक बोलूँगा भी नहीं।
तेरी पदचाप से चौकन्ना हो जाता था जो बदन,
अब तेरे आसपास होने पे भी ये थिरकेगा नहीं।
स्वप्न है सवेरे सिरहाने तू होगी तो बन जायेगा दिन,
जो ख्वाब ये मुक्कमल हुआ तो आंख मैं खोलूँगा भी नहीं।
नहीं खोलूँगा आंख निर्णय है मेरा पर तुझे पता है,
बन्द आंखों में भी तेरा रूप देखूंगा यूँही।
शायद तुझे मालूम है कि मैं तुझसे नाराज़ हूँ।
बस मेरे हाथ पे हाथ रख मुस्करा दे अभी,
आज के बाद फिर ना रूठूँगा मैं कभी।
--------------©अभिषेक
तो तुझसे कुछ दिन तक बोलूँगा भी नहीं।
ख्वाहिश थी, तेरी गली से गुजरूं, तू छत से निहारे,
अब जो गुज़रा तो मुड़ के तुझे देखूंगा भी नहीं।
कभी तेरी खुशबू की हमें दिल से आस थी,
अब जो तू हवा में महके तो सांस लूंगा भी नहीं।
नहीं लूंगा मैं सांस मगर तू जानती है कि
अपनी हर सांस में बस तेरा नाम लूंगा यूँही।
शायद तुझे मालूम है कि मैं तुझसे नाराज़ हूँ,
तो तुझसे कुछ दिन तक बोलूँगा भी नहीं।
तेरी पदचाप से चौकन्ना हो जाता था जो बदन,
अब तेरे आसपास होने पे भी ये थिरकेगा नहीं।
स्वप्न है सवेरे सिरहाने तू होगी तो बन जायेगा दिन,
जो ख्वाब ये मुक्कमल हुआ तो आंख मैं खोलूँगा भी नहीं।
नहीं खोलूँगा आंख निर्णय है मेरा पर तुझे पता है,
बन्द आंखों में भी तेरा रूप देखूंगा यूँही।
शायद तुझे मालूम है कि मैं तुझसे नाराज़ हूँ।
बस मेरे हाथ पे हाथ रख मुस्करा दे अभी,
आज के बाद फिर ना रूठूँगा मैं कभी।
--------------©अभिषेक
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें