जाने क्यों हमको भूल गए!

हवा बसंती इठलाकर जो
छू ले लू सी हो जाये,
जो पुष्प मनोहर सुगंध बिखेरे
मुरझा वो सारे फूल गए,
जो कहते थे कि संगी हैं हम
अब जाने क्यों हमको भूल गए?

मधुर लगी वाणी जिनकी
उनके शब्द शूल में बदल गए,
जहां जहां गिरी बारिश की बूंदें
वहां वहां हम झुलस गए,
जो कहते थे कि संगी हैं हम
अब जाने क्यों हमको भूल गए?

      ------- © अभिषेक

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