मैं तो बस मैं हूँ

मैं तो बस मैं हूँ,
न मुझे राह की परवाह है,
मुझे न डर, न  सुकून चाहिए।
                      इसे पढ़ें-कौन हो तुम?
लड़ता हूँ खुद से,
हर हार का हमराही हूँ,
मुझे न जीत, न जुनून चाहिए।
                      इसे पढ़ें-कर्म लौटकर आया।
जो मंज़िल दूर है,
तो रहने दो उसे दूर ही मुझसे,
न गाड़ी, न पत्थर का मकान चाहिए।

जो कहते हैं तुमसे,
कि बनो बेहतर हर जगह पर,
न उपलब्धि, न ही मुझे नाम चाहिये।

हां चुनता हूँ शब्द,
क्योंकी न समझाना है खुद को,
न लोगों का झूठा यक़ीन चाहिए।

कैसे छोड़ दूं हर सीख को,
जब भी गिरा हूँ, उठा हूँ, वापस बढ़ा हूँ,
मुझे न जीतना है न इनाम चाहिए।

मुझसे कहती है मेरी माँ,
मुझे तू अफसर जैसा नहीं,
बस एक बेहतर इंसान चाहिए।
---©अभिषेक

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