सावन की बूंदें

 चारू आज बहुत खुश थी , हो भी क्यों ना आखिर आज वह अपने चाचा के साथ शहर रहने जो जा रही थी ꫰ छोटी सी बच्ची अपनी जितनी यादों को समेट पायी समेटती रही ꫰ गांव की माटी ,बाग़ का पीला फूल जिसे वह गेंदवा कहती थी , गुड़िया, माँ की काजल की डिबिया ,बापू की कलम , सहेलियों की चोटी केे फीते सब तो रख लिया उसने फिर उसे ऐसा क्यों लग रहा था कि जैसे वो कुछ भूल रही है , नहीं शायद वो कुछ नहीं भूली ꫰ "चारू" चाचा ने पुकारा तो वह फुदकती हुई चाचा के पास चली गयी ꫰ "चारू चलें ?" , "हाँ चाचा अब मुझे इस गाँव में नहीं रहना ꫰" चारू सुबकती हुई बोली ꫰ वह इस गाँव से नाराज है ꫰ आज के तीन बरस पहले इसी गाँव में बाढ़ की चपेट में आये माँ बाप को उसने खो दिया था ꫰ " ऊपर चढ़ लड़की " चाचा ने टोका ꫰ बड़ी सफेद रंग की गाड़ी पहली बार तो देखी थी उसने꫰ जैसे ही गाड़ी में पहला कदम रखा उसे किसी ने रोका , " रुक चारू "पीछे मुड़कर देखा तो उसकी सहेली नाजिया हाथ में कुछ लिए खड़ी थी ꫰ " ये क्या है री ?", " देखती नहीं तेरे लडडू गोपाल लायी हूँ , जो तेरा हमेशा ख्याल रखते हैं तू उन्हें ही भूली जा रही , नाजिया उलाहना देते हुए बोली ꫰ चारू ने ख़ुशी से नाजिया को गले लगा लिया और उसने भी चारू के हाथ चूम लिए एक और नयी याद समेट चारू गाड़ी में बैठ गयी और गाड़ी चल पड़ी ꫰
वही बीहड़ गाँव , नदी, गाँव का किनारा सब एक एक कर पीछे छूटते जा रहे थे और वो नन्हीं चारू एक नयी आशा केे साथ आगे बढ़ रही थी ꫰
" चाचा क्या यहीं से शहर शुरू होता है?" , " हाँ बेटा" ꫰ बिजली की चकाचौंध ,बड़ी-बड़ी सडकों पर दौड़ती गाड़िया , ऊँचे ऊँचे माकान चारू को ये सब स्वर्ग सा लग रहा था꫰ अपने और शहर के प्रथम मिलन को वह अपने मन में कैद करना चाह रही थी ꫰ कुछ देर पश्चात चारू एक बड़े से गेट के आगे खड़ी हो गयी ꫰ चाचा का हाथ थामे वो एक बन्द छोटे कमरे में घुस गयी और ये क्या वो तो तीसरी मंजिल पे आ गयी ꫰ " यहां कमरे भी चलते हैं वो मन ही मन सोचने लगी "꫰ ऊपर आ कर वह एक दरवाजे के आगे खड़ी हो गयी, चाचा ने घंटी बजायी थोड़ा इंतजार करने के बाद दरवाज़ा खुला ꫰ " अरे चारू" , "चाची!चाची!" कहकर चारू रोते हुए चाची केे गले से लिपट गयी ꫰ "चारू आज से यही तुम्हारा घर है " चाचा ने प्यार से उसका सर सहलाते हुए कहा ꫰ सब अंदर आ गये ꫰ चारू अभी भी चाची की गोद में थी ꫰ माँ बाप के गुजरने के बाद चाची से ही उसने ममता का सुख पाया था ꫰ चाची ने दुलराते हुए चारू से पूछा," मेरी चींचीं क्या खायेगी?" चारू कुछ न बोली वो सो गयी थी꫰ मासूम बलिका उसे बड़े घर से क्या मतलब उसके लिए तो उसकी छोटी माँ की गोद ही बहुत थी꫰
चाचा चाची केे भी कोई संतान नहीं थी꫰ अतः वो उस पर जान छिड़कते हैं꫰ चाची तो प्यार से चारू को चींचीं कहती थी ꫰ कुछ देर बाद चारू की नींद खुली वह ऊँचे बिस्तर पर लेटी हुई थी उसे उठा देख चाची बोली ,"क्या नींद पूरी हो गयी चींचीं और सो जा ꫰" वो शांत बैठी रही उसे गुमसुम देख चाची ने पूछा," क्या हुआ री? मैं माँ हूँ तुम्हारी बेटा, अपनी माँ से कोई शांत रहता है क्या?" " चाची मेरी सहेलियां मेरे साथ नहीं उनके बिना मुझे अच्छा नहीं लगता ꫰" , " अच्छा तो मैं चाचा से कह केे उन्हें भी बुलवा लूंगी ꫰" चाची की बात सुन बच्ची खुश हो गयी ꫰ तभी दरवाजे पे किसी ने आहट दी, चाची उठ कर दरवाजा खोलने गयी, दरवाजे पे बगल वाले फ़्लैट की रवीना आंटी थी साथ में उनका बेटा रजत भी था, " अरे रवीना जी आइये बड़े दिन बाद आयी हैं" ," हाँ मैं भाई के यहाँ से कल ही लौटी हूँ"꫰ सब बैठ गये बातें होने लगी पर चारू कहीं नजर नहीं आयी ꫰ " आपकी भतीजी नहीं दिख रही कहाँ है वो? " रवीना आंटी बोली ꫰ " हाँ आंटी आपकी बेटी कहाँ है?" रजत भी चहकते हुए बोला ꫰ " वो अंदर है बाहर आने में शर्मा रही है,चाची हँसकर बोली और अंदर चली गयी ꫰ अंदर चारू अपने लडडू गोपाल को नए वस्त्र पहना रही थी चाची चुपचाप उसे देखती रही ꫰ वस्त्र पहना कर उसने लडडू गोपाल के कान में कुछ कहा और फिर मुस्कुरा कर उन्हें अलमारी में रख दिया ꫰ पीछे चाची को खड़ा देख वह उनसे लिपट गयी ꫰ चाची उसे बाहर कमरे में ले आयी ꫰ "चारू देखो ये रवीना आंटी और ये रजत नमस्ते करो इनसे बेटा" चारू ने अनमने भाव से नमस्ते किया और अंदर जाने लगी तभी रजत ने उसे टोक दिया," हेलो चारू मैं रजत चलो हम लोग पार्क में खेलने चलें"꫰ चारू ने अपनी माँ की ओर देखा ꫰ चाची ने प्यार से चारू से कहा ,"बेटा तुमने ही कहा था ना कि मुझे खेलने के लिए दोस्त चाहिए, देखो रजत है ना चलो दोनों लोग अंदर जाकर खेलो꫰" दोनों अंदर चले गए ꫰ रजत चारू से दो तीन वर्ष बड़ा होगा शायद यही वजह रही होगी जो चारू की उससे बनती न थी ꫰ दो तीन दिन रजत ने हरसंभव कोशिश की उससे दोस्ती करने की पर चारू उससे एक शब्द न बोली ꫰ रजत ने अब आना बंद कर दिया ꫰ वह चारू को गाँव की कह कर चिढ़ाने लगा इससे चारू ने और भी बात करना बंद कर दिया ꫰
जुलाई के महीने की पहली तारीख, नन्हीं नन्हीं फुहारों ने जुलाई का जोरदार सवागत किया, सुबह से होती हल्कीं बारिश सभी का मन मोह रही थी ꫰ चारू भी आज बहुत खुश थी उसे बारिश में भीगना अच्छा लगता था लेकिन इन बंद घरों में चारू तो क्या खिड़की से बाहर निकला उसका हाथ तक ना भीगा वह उदास हो गयी और जाकर अपने लडडू गोपाल से शिकायत करने लगी ꫰ " चारू कहाँ गयी इधर आ " चाची तेज कदमों से अंदर आयीं और फटाफट उन्होंने चारू को नए कपड़े पहनाये꫰ " ये क्यों चाची क्या हम कहीं घूमने जा रहे हैं ?", " .नहीं आज से मेरी चींचीं स्कूल जाएगी और पढ़ लिखकर अपनी चाची को घुमाने ले जाएगी , ले जायेगी ना? " चाची की चींचीं हँस दी चाची ने उसका सर चूम लिया ꫰ चाचा और चाची दोनों उसे स्कूल छोड़ने गये, गाड़ी में बैठ चारू फिर एक और नयी आशा की किरण की ओर चल पड़ी ꫰
बड़ा सा स्कूल पहली बार चारू ने इतना बड़ा स्कूल देखा , खैर बिना देर किये एक आया गेट से चारू को ले गयी ꫰ अपनी क्लास में पहुँच कर वो सबसे पिछली सीट पर बैठ गयी डरते डरते उसका वह दिन पूरा हुआ ꫰ छुट्टी की बेल बजते ही बैग उठाकर सबसे पहले दौड़कर बाहर निकल गयी ꫰ गेट पर उसके चाचा खड़े थे वह फुदकती हुई उनके पास पहुँच गयी ꫰ चाचा ने उसे गोद में उठा लिया और गाड़ी में बिठा दिया ꫰ चाचा अभी भी गेट पर ही खड़े थे ꫰ थोड़ी देर बाद वह आये तो उनके साथ रजत भी था ꫰ " ये क्यों आया है? क्या ये भी यहीं पढता है मुझे पता होता तो मैं यहाँ ना पढ़ती ꫰ " चारू मन ही मन सोचने लगी ꫰ गाड़ी में बैठते ही रजत हँस दिया " अरे तू भी बैठी है चलो पढ़ लिख जायेगी तो अच्छा ही रहेगा ꫰ चारू को ये बात खल गयी लेकिन वो कुछ नहीं बोली ꫰ चारू ने घर आकर ये बात चाची को बतायी ꫰ चाची ने उसे प्यार से समझाया " बेटा रजत ने गलत कहा है पर फिर भी तुम उससे गलत नहीं कहोगी " ," क्यों? चाची वो मुझे चिढ़ाता है मैं भी उससे बदला लूँगी ꫰" " फिर तुझमे और और उसमें क्या अंतर ? " चाची थोड़ा गुस्से में बोली ꫰" "देखो बेटा किसी से मार खा केे उसे मार देने से दोनों ही बराबर दर्जे केे हुए ना ,यदि किसी को उसकी गलती का अहसास कराना ही है तो कभी कभी शांत रहकर भी ये किया जा सकता है तुम बस मन लगा कर पढ़ो और एक दिन उसे दिखा देना की गाँव वाले ही असल व्यक्तित्व वाले होतें हैं ꫰ " चारू ने सब सुना पर उसे इतना ही समझ आया कि उसे फिलहाल मन लगा कर पढ़ना है ꫰
दिन बीतते गये चारू समझदार होने लगी कक्षा में वह सभी टीचरों की चहेती बन गयी , क्लास केे सभी बच्चे उसे अपनी अच्छी मित्र भी मानने लगे वो सभी से प्यार से बात करती थी और तो और अब रजत भी उससे अच्छे से बात करने लगा था ꫰ इस वर्ष की परीक्षा में चारू ने कक्षा में तीसरा स्थान प्राप्त किया ꫰ चाचा चाची ने उसे बाँहों में भर लिया ꫰ चाची ने अाज उसकी मन पसंद मिठाई भी बनायी ꫰ शाम को वो चाचा केे साथ घूमने गयी और ढेरों मन पसंद खिलौने और कपड़े लिए ꫰ चारू जब घर आयी तो घर में रवीना आंटी और रजत बैठे थे रजत ने तोहफे में उसे एक किताब दी चारू ने ख़ुशी ख़ुशी सब स्वीकार किया , उसके लिए ये दिन यादागार बन गया ꫰
वक़्त बीतता गया नन्हीं चारू अब बड़ी हो रही थी वह अब शहर की आदतों में ढलने लगी थी , उसे भी अब दोस्तों संग बातें करना अच्छा लगता था वह सहेलियों के साथ रोज पार्क में खेलने जाती थी ꫰ चारू को शहर में आये लगभग पांच वर्ष हो गये थे इतने सालों में उसने बहुत कुछ सीखा, चाचा के साथ वह लगभग सारा शहर घूम चुकी थी ꫰ इन पांच सालों में चाचा चाची ने उसके चेहरे पे दुःख की एक लकीर तक नहीं खिंचने दी ꫰
इस साल चारू का हाईस्कूल था परीक्षाओं केे शुरू होने के महीने भर पहले ही उसके चाचा का स्थानान्तरण हो गया ꫰ चारू ने भी साथ जाने की जिद्द की लेकिन वह इस हठ में सफल नहीं हुई चाचा ने उसे चाची केे साथ ही रहने को कहा और साथ ही ये वादा भी किया कि वापस आने पे वह उसे उसकी हर मनपसंद जगह घुमाने ले चलेंगे ꫰ चाचा चले गये और वो चाची केे साथ अंदर आ गयी ꫰ परीक्षाओं की तैयारी के लिए अधिक मेहनत से वह अस्वस्थ हो गयी उसे तेज बुखार चढ़ गया , चाची घबरा गयीं अब क्या करे कल ही से उसकी परिक्षाएं शुरू हैं ꫰ उन्होंने रवीना आंटी को बुलाया थोड़ी देर में रवीना आंटी अपने पति के साथ चारू को डॉक्टर के पास ले गयीं ꫰ डॉक्टर ने उसे एक दिन भर्ती होने को कहा परंतु चारू ने मना कर दिया , डॉक्टर ने कुछ दवायें दे दी उन दवाओ केे असर से चारू स्कूल जाने लायक तो हो गयी लेकिन अभी भी उसमें वो सामर्थ्य नहीं था ꫰ दूसरे दिन रजत का भी इंटर का पेपर था अतः चारू रजत केे पिता केे साथ ही स्कूल चली गयी ꫰ स्कूल में रजत उसे क्लास तक छोड़ने गया ꫰ अब चारू सभी पेपरों में रजत के पापा के साथ ही जाती और इसी कारण रजत और चारू में काफी अच्छी दोस्ती भी हो गयी थी ꫰
अाज चारू केे मन में दुगनी प्रसन्नता थी क्योंकि एक तो अाज उसके चाचा घर आये थे और दूसरी आज उसका परीक्षाफल आना था वह अपने चाचा के साथ दोपहर का भोजन कर रही थी तभी रवीना आंटी आ गयी और उन्होंने बताया कि रजत इंटर में स्कूल का दूसरा टॉपर है इसलिए अाज रात का डिनर सब उनके यहां आकर ही करे ꫰ दोपहर बाद तक चारू का भी परीक्षाफल आ चुका था और वह अपने स्कूल की टॉपर थी , चाचा चाची केे आँखों से खुशी के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे और अपने आपको दुनिया में सबसे भाग्यवान समझ रहे थे ꫰ सबसे बधाईयाँ लेते लेते रात होने लगी थी और अब चारू भी बहुत थक चुकी थी , वह सोने के लिए अपने कमरे में जाने लगी तभी पीछे से रजत ने उसे बुलाया, " चारू घर चलो सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं और तुम सोने जा रही " , " रजत मैं बहुत थक गयी हूँ मैं कल आ जाउंगी " रजत ने कुछ नहीं सुना ," मैं नहीं जानता तुम चलो बस " " अच्छा ठीक है तुम चलो मैं आ रही हूँ " रजत चला गया ꫰
पूरी तरह से जश्न का माहौल था रजत के यहाँ , उसके सारे दोस्त संगीत की धुन में नाच रहे थे लेकिन रजत की नजरे दरवाजे पे ही टिकी थी ꫰ आखिरकार उसका इंतजार खत्म हुआ꫰ पिंक रंग की ड्रेस में चारू किसी परी से कम नहीं लग रही थी ꫰ उसे देखते ही रजत ने ताली बजाकर उसका स्वागत किया ꫰ चारू वहाँ रजत केे सिवाय किसी को भी भली भांति नहीं जानती थी अतः वह रजत के बगल में ही जाकर बैठ गयी ꫰ जश्न शुरू हो गया केक कटने केे बाद सबने मिलकर डिनर किया तभी किसी ने चारू को अनाथ कहकर चिढ़ा दिया ꫰ चारू के मन में बुरी तरह ठेस लग गयी , गुस्से में उसके ओंठ फड़कने लगे ꫰ रजत उसकी मनःस्थिति को समझ गया, उसने चारू के कंधे पर हाथ रखकर इशारे से शांत रहने को कहा, और फिर बोला "हेलो दोस्तों आज की ये पार्टी तो खत्म होने वाली है लेकिन क्या तुम सब जानते हो ये पार्टी किस खुशी में मैंने दी ?" ," हाँ तुमने टॉप जो किया है रजत"सब एक स्वर में बोले लेकिन रजत ने नहीं में सर हिलाया और कहा " अाज मेरी सबसे अच्छी दोस्त ने पूरे स्कूल में टॉप किया और उसके नंबर अपनी क्लास के टाॅपर से भी आधिक हैं और वो है चारू " सब लज्जित हो गये और चारू की बढ़ाई करने लगे वह सब चारू से माफी मांगने के लिए उठे लेकिन चारू तो यहाँ है ही नहीं कहाँ गयी वह? रजत अंदर गया चारू उसकी माँ केे साथ किचन में सहायता करा रही थी वह मुस्कुरा कर लौट आया ꫰ थोड़ी देर बाद सब चले गए"चारू अब तुम भी जाओ और आराम करो" रवीना आंटी प्यार से बोलीं ꫰ चारू किचन से बाहर आ गई कमरे में कोई नहीं था तभी दरवाजे के पास किसी से उसका हाथ पकड़ लिया " सॉरी चारू अपने दोस्तों की ओर से मैं तुमसे माफी मांगता हूँ꫰" " अरे रजत तुम,मैं तो डर गयी "अनायास ही चारू ने भी अपना हाथ रजत के हाथ में रख दिया और बोली"नहीं रजत मैं किसी से नाराज नहीं हूँ" दोनों मुस्कुराने लगे ꫰ चारू चलने लगी लेकिन रजत ने उसका हाथ अभी तक नहीं छोड़ा था उसने पलटकर देखा रजत बड़े गौर से उसे देख रहा था चारू केे शरीर में एक कम्पन सा उत्पन्न हो गया लेकिन वह इस कम्पन को पहली बार अपने शरीर में महसूस कर रही थी " रजत मेरा हाथ छोड़ो मुझे देर हो रही है " पहले वादा करो कि कल शाम फिर आओगी ꫰" चारू ने हाँ में सर हिला दिया ꫰ वह घर आकर चुपचाप कमरे में लेट गयी ꫰ लेकिन उसे नींद नहीं आयी उसने लैंप भी बंद कर दिया और जैसे ही उसने आंखें बंद की उसके सामने रजत की सूरत आ गयी ये सिलसिला काफी देर तक चलता रहा वह घबराकर उठ गयी और बाहर बलकनी में आ गयी ꫰
ऐसा क्यों हो हो रहा था उसे कुछ समझ नहीं आया वह शांत आकाश की ओर देखने लगी सहसा उसे लगा कि जैसे चाँद से रजत झाँक रहा है उसने अपनी आँखें बंद कर ली ꫰ सारी रात गुजर गयी लेकिन उसे एक झपकी तक नहीं आयी और ना ही वह रजत की नजरों की भाषा पढ़ सकी ꫰
दूसरे दिन दिनभर चाचा की लाडली उन्ही के साथ खेलती रही ꫰ शाम को जब चाचा चाची बाहर गये तो वह रजत के यहाँ आ गयी , " अरे चारू आओ मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था ये कह कर रजत ने टीवी बंद कर दी꫰ चारू बैठ गयी एक एक कर रजत ने सारे उपहार चारू को दिखाए फिर इधर उधर की बातें होती रही तभी किसी ने बेल बजायी रजत बाहर चला गया इधर चारू ने टेबल पे रखी बुक उठा ली और पन्ने पलट पलट कर देखने लगी उसे एक लिफाफा मिला उसने उसे खोलकर देखने लगी लेकिन ये क्या इसमें तो उसी की फोटो ये " लेकिन मेरी फोटो रजत के पास कैसे आयी ?" ये तो स्कूल के वार्षिकोत्सव की है उसी दिन तो उसने यही सूट पहना था लेकिन ये इसके पास कैसे.......? चारू सोच में पढ़ गयी उसने फोटो वैसी ही किताब में रख दी और वहां से अलग हटके बैठ गयी ꫰
थोड़ी देर में रजत दो कप चाय लेकर कमरे में दाखिल हुआ," ये लो चारू मैंने अपने हाथ से बनायी है चाय " ,"नहीं रजत अब मैं चलूँगी " चारू ने अनमने भाव से कहा꫰"अरे अभी तो आयी हो,थोड़ी देर और बैठो ना , पता है चारू जब तुम मेरे साथ होती हो तो मुझे बहुत अच्छा लगता है " रजत उसे चाय देते हुए बोला ꫰ चाय आधिक गरम होने की वजह से चारू को न चाहकर भी बैठना पड़ा ꫰ कुछ और बातें होने केे बाद वह घर आ गयी ꫰ दो तीन दिन बाद वह फिर रजत के यहाँ गयी , रजत अकेला था और किचन में कुछ बना रहा था ," अरे अच्छे वक्त पे आयी चारू तुम बैठो मैं बस दो मिनट में आया ꫰ चारू सीधे रजत की टेबल पे पहुँची और वो लिफाफा उठा कर देखा तो वो अचम्भित रह गयी अाज एक नहीं तीन फोटो थी उसकी "आखिर वह ऐसा कर क्यों रहा है ? " रजत केे आने पर चारू ने उससे पूछ ही लिया ꫰ रजत चारू केे बगल में बैठ गया " तुम्हें तो पता है ना कि मुझे फोटोग्राफी करना पसंद है बस उसी सिलसिले में तुम्हारी फोटो भी मेरे पास है "꫰ परन्तु चारू को इस बात से संतोष न हुआ कुछ तो अलग हैं रजत के भाव जिसे नादान चारू नहीं समझ रही है ꫰ जब वह चलने लगी तो रजत ने उससे हाथ मिलाया और न जाने क्यों रजत ने अपना हाथ चारू के गालों पे फेर दिया परन्तु आश्चर्य की बात ये की चारू ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की वह रजत को देख कर भीनी मुस्कान से मुस्कुराने लगी ꫰ चारू ने ऐसा क्यों किया ये तो वह भी नहीं समझ पायी लेकिन उसे इतना आभास अवश्य हो गया था कि उसकी मनःस्थिति ऐसी हो गयी है जिससे कि उसकी भावनाओं में आंशिक परिवर्तन हो गया है और समय के साथ यही भावनायें अधिकार जमा रही हैं उसके मन पर ꫰ और चारू ने इन भावनाओं को खुशी खुशी अंगीकार किया ꫰
इंसान को जब रोजमर्रा की जिंदगी में कोई नया पल मिलता है तो वह उसे अपनाने में ही अपनी जीत समझता है꫰ और यही पल अगर भावों में कामनाओं के रूप में उद्धृत हों तो जीव भंवर में डूबती नौका केे समान ही इसमें फंसता जाता है ꫰
अब चारू को रजत के साथ समय बिताना अच्छा लगता था लेकिन उन दोनों ने इस बात का अहसास अपने घरवालों को नहीं होने दिया और वैसे भी युवाओं का मन पढ़ना वयस्कों के लिए आसान नहीं होता ꫰
प्रकृति के नियमानुसार चारू अपनी बढ़ती उम्र के स्वभावों में ढलने लगी दिन में एक बार वह रजत से अवश्य मिलती ꫰ रजत केे पास अब चारू की अनेको फोटो थी जिनमे तो कुछ स्वयं चारू ने दी थी और कुछ रजत चुपके से ले लेता और बाद में चारू को दिखाकर खूब हँसता रजत की इसी हँसी पर चारू न्यौछावर हो जाती ꫰
समय बितता गया चारू ग्रेजुएशन कर चुकी थी तोहफे केे रूप में रजत ने उसे एक नेकलेस दिया चारू बहुत खुश हुई ꫰ शाम को दोनों एक रेस्तरां में गये और आमने सामने बैठ गये ꫰ " चारू,नेकलेस कैसा है सच सच बताओ? " , "रजत सच में बहुत अच्छा है ये मेरे जीवन का पहला तोहफा है जो मुझे प्रेम का पहला पाठ याद करने पर मिला है ꫰" रजत हँस दिया ꫰ " रजत अाज भी मुझे वो दिन याद है जब तुमने कहा था कि, तुम नादान हो प्रेम करना नहीं जानती अनपढ़ हो तुम ꫰ तभी मैंने सोच लिया था कि ये नयी बला "प्रेम" मुझे सीखनी है ꫰ " रजत ने चारू को हाथ पकड़ लिया "नहीं चारू भूल जाओ ना ꫰ मैं सच में बचपन में तुमसे बहुत चिढ़ता था , लेकिन मैं नहीं जानता था कि मेरी प्रेम की माला की मोती तुम ही बनोगी ꫰ "
रजत भावुक हो गया ꫰ "अरे रजत इसमें इतना भावुक होने की क्या बात है꫰ प्यार तो सब एक दूसरे से करते हैं मैं भी अपनी चाची से बहुत प्यार करती हूँ लेकिन मैं इतना भावुक तो नहीं होती ꫰" रजत ने अपना माथा पकड़ लिया कैसे समझाये वह चारू को कि ये प्यार उसकी चाची वाला नहीं है एक बार तो उसे लगा कि वह फिर से चारू को अनपढ़ और गंवार कह दे लेकिन वह कह नहीं सका ꫰ परन्तु अपनी भड़ास निकालने केे लिए उसने अपना हाथ जोर से मेज पर मार दिया ꫰ मेज पे रखा कैंडल बाउल नीचे गिर गया रंग बिरंगी बिखरी हुई कैंडल रजत का गुस्सा साफ प्रदर्शित कर रही थी ꫰ रैस्त्रां में मौजूद सभी लोग उठ कर रजत को देखने लगे ꫰ रजत कुछ समझता इससे पहले वहाँ का मलिक दनदनाते हुए रजत केे पास आ गया और गुस्से में बोला " आपको हमारा नुकसान भरना होगा हाँ ꫰" तभी दूसरा आदमी व्यंग करते हुए बोला " हे हे यहाँ प्यार का इजहार करने आये थे या युद्ध करने " सभी हँसने लगे ꫰ खैर कुछ रूपये देकर दोनों वहाँ से आ गये रास्ते में कोई भी एक दूसरे से नहीं बोला ꫰
दूसरे दिन रजत सो कर उठा तो उसे तीव्र ज्वर था ꫰ माँ के पूछ्ने पर भी वह कुछ न बोला उसने डॉक्टर के यहाँ जाने से भी मना कर दिया ꫰
शाम तक यह खबर चारू के घर आयी चारू सब समझ गयी चाची ने साथ चलने को कहा परन्तु वह न गयी ꫰ दो दिन व्यतीत हो गए लेकिन रजत की सेहत नहीं सुधरी ꫰ शाम को जब रजत घर पर अकेला था तो वह उसके घर गयी और चुपचाप उसके कमरे में बैठ गयी ꫰ किसी की आहट पाकर रजत ने आंखे खोली ,"तुम यहा क्यों आयी हो जा सकती हो तुम ꫰" रजत ने आंखे बंद करते हुए कहा ꫰ " रजत तुम्हारा गुस्सा जायज है और तुम्हारा पूरा हक है मुझ पर गुस्सा करने का लेकिन तुम मुझे गलत न समझो꫰" इतना कहकर उसने अपना हाथ रजत के सर पर रख दिया ꫰ रजत कुछ बोल न सका लेकिन उसे ऐसा लगा जैसे उसका बुखार गायब हो गया हो वह एकटक चारू को देखता रहा उसके आँसू छलक आये , " च - चारू तुम मेरी प्रेमिका ही नहीं मेरी ईष्ट भी हो तुम " यह कहकर रजत ने चारू को अपनी बाँहों में भर लिया ꫰ चारू के इस निः शब्द प्यार से वह समझ चुका था कि प्यार कहा नहीं जाता वस्तुतः ये महसूस किया और समझा जाता है ꫰
वक्त की गाड़ी अपनी रफ़्तार में चलती रही ꫰ एक दूजे के रंग में रंगे दोनों युवा प्रेमियों को अपनी जीवन नदी की हर लहर में अपना प्यार ही नजर आता ꫰
उस दिन सावन माह की एकादशी थी घने काले बादलों से गिरती नन्हीं फुहारें प्रेमियों केे दिल को विरही बना रही थीं ꫰ रजत की बलकनी में लगे गुलाब के पौधों पर पड़ती फुहारें ऐसी ध्वनि कर रही थी जैसे बचपन में चारू के पैरों में पड़ी पाजेब ꫰ रजत चारू को याद करते हुए दूर पार्क में आ गया ꫰ वह एक बेंच पर बैठ गया ꫰ तभी उसके कंधे पे किसी ने हाथ रखा ,कौन हो सकता है इस बारिश में ? " अरे चारू तुम , तुम यहाँ कब आयी और तुम्हे कैसे पता कि मैं यहाँ हूँ और सुबह से तुम मुझे नजर क्यों नहीं आयी ? "
" बस बस रजत इतने सारे प्रश्नों के उत्तर मैं एक साथ कैसे दूंगी?" दोनों हँसने लगे उनकी इस खिलखिलाहट केे साथ झनकती बूंदे भी हँसने लगीं ꫰ रजत चारू के थोड़ा समीप आ गया उसने चारू को सीने से लगा लिया ꫰ नभ पे साये की तरह छायी घटाओं ने दोनों को भीगो दिया ꫰ चारू की धडकनों केे आगे बिजली की कड़कडाहट और बादलों की गरज धीमी हो गयी ꫰
बारिश थम चुकी थी लेकिन रजत के कंधे अभी भी भीग रहे थे उसने चारू का सर उठाया," अरे चारू तुम रो क्यों रही हो?" चारू ने भीगी आँखों से रजत को देखा वह फिर से उससे लिपट कर रोने लगी ꫰ चारू ने रुधें स्वर में पूरी कहानी बतायी ꫰ असल में चारू के चाचा का एक्सीडेंट हो गया था जिस वजह से उसका और उसकी चाची का चाचा केे पास जाना आवश्यक हो गया था और अगर एक बार वो यहाँ से गयी तो फिर उसका लौट कर आना मुश्किल था ꫰ एक अनिश्चित समय तक कैसे रहेंगे दोनों एक दूसरे से अलग यही बात उसे परेशान कर रही थी ꫰ " नहीं चारू तुम मत जाओ मैं तुम्हे देखे बिना कैसे रहूँगा ?" रजत ने चारू का हाथ पकड़ कर कहा ꫰ " रहना तो पड़ेगा रजत एक उम्मीद लेके जियेंगे हम, मिलन की आश का दिया बनकर जलेंगे हम , चातक बन कर रहेंगे स्वाति नक्षत्र का इंतज़ार करेंगे꫰ हम एक दूसरे की याद में सांस लेते रहेंगे लेते रहेंगे ..........꫰ मौसम में एक उदासी छा गयी दोनों अपलक एक दूसरे को देखते रहे वो कुछ कह न सके ꫰
दूसरा दिन , अभी भोर होने में कुछ देर थी चारू अपनी चाची के साथ नीचे गेट पर खड़ी थी ड्राइवर सारा सामान गाड़ी के ऊपर बांध रहा था ꫰ चारू आखरी बार अपने प्यार से मिलना चाहती थी उसने चाची से कहा ," चाची मैं रवीना आंटी से मिल आऊं? " चाची ने मना कर दिया ," नहीं बेटा इतनी जल्दी वो अभी सो रही होंगी, मैं उनसे कल मिल चुकी हूँ ꫰ हम लेट हुए तो ट्रेन छूट जाएगी ꫰" दोनों गाड़ी में बैठ गयी एक और नयी याद छूट गयी चारू की इस नये शहर में ꫰ उधर आकाश में भोर का तारा एक नयी सुबह के आने की सूचना दे रहा था परन्तु क्या चारू इस नयी सुबह में प्रसन्न होगी? ट्रेन छूटने में अभी कुछ देर थी चारू खिड़की से अपना हाथ बाहर निकाले थी उसने एक गहरी सांस लेकर खुद को निश्तेज अवस्था से दूर किया तभी सहसा किसी ने उसका हाथ छुआ चौंककर उसने खिड़की से झाँका , अरे ये क्या रजत यहाँ खड़ा है लेकिन बगल में बैठी चाची की वजह से वह कुछ बोल नहीं सकी उसने हौले से रजत के गालों को छुआ और फिर अपने हाथों को होठों से लगा लिया ꫰ गाड़ी चल पड़ी आखिरी बार रजत ने चारू केे हाथों को छूना चाहा लेकिन अफसोस दोनों के हाथ आगे बढ़कर भी एक दूसरे को छू न सके ꫰ शून्य होकर रजत खड़ा रह गया उसकी भावना और मन चारू केे साथ ही चला गया ꫰ एक बुजुर्ग काफी देर से दोनों को देख रहे थे रजत को भाव हीन देख वो उसके पास गये और बोले," युवक प्रेम किया है तो प्रेम को निभाना भी सीखो, तुम्हारे इस तरह निराश होने से क्या तुम प्रेम का तिरस्कार नहीं कर रहे?" रजत सिर झुका कर ध्यान से उनकी बात सुनता रहा ꫰ बुजुर्ग ने रजत केे कंधे पर हाथ रखकर कहा , " अगर तुम ये समझो कि प्रेम निराकार है तो वह तुम्हारे पास हमेशा ही रहेगा और वह कन्या जिसके तुम पुजारी हो वह इस निराकार प्रेम की एक परछाई थी और परछाई कभी भी अपने सकारात्मक रूप से अलग नहीं होती अतः इस निराकार प्रेम को अंगीकार करो ꫰ और अगर तुम प्रेम को कुछ हद तक साकार समझते हो तो ये याद रखना कि सूरज डूबता है परन्तु हमेशा के लिए नहीं एक निश्चित समय पर फिर प्रकाशमान होता है और प्रेम का साकार रूप भी ऐसा है ꫰ रजत के मन एक आशा का दीपक जल उठा उसने उनका आभार व्यक्त किया और घर आ गया ꫰
उधर चारू जब पूर्णतया होश में आयी तो वह मुंबई केे एक बड़े सिटी हॉस्पिटल में थी जहाँ वह चाचा जी को देखने पहुँची थी ꫰
चाचा के शरीर में जगह जगह पट्टियां बंधी हुई थी उन्हें देख चाची जोर से रोने लगीं उन्हें रोता देख दोहरे गम में डूबी चारू ने चाची को संभाला और अपने पिता तुल्य चाचा के पैरो के पास बैठ गई ꫰ उसकी चमकीली आँखों में आँसू देखकर चाचा जी अपने आपको अपमानित महसूस कर रहे थे जिस लाडली को उन्होंने कभी उदास तक नहीं होने दिया आज उन्हीं की वजह से वह रो रही थी वह मन मसोस कर रहा गये थोड़ी देर में डॉक्टर आये उन्होंने चाचा जी को खतरे से बाहर बताया सभी को भगवान का शुक्रिया अदा किया ꫰

कुछ महीने बाद ............
मुंबई के एक छोटे से फ़्लैट की खिड़की से चारू सागर में खेलती लहरों को देख रही थी ꫰ सागर में जितना अथाह जल था उतनी ही अथाह वेदना उसके मन में थी अपनी विरह वेदना की अग्नि को आँसूओं से शांत करके उठी और व्हीलचेयर में बैठे चाचा जी केे पास जाकर बैठ गयी उसे शांत देख चाचा ने पूछा, " क्या बात है चींचीं इतना उदास क्यों है तू ?" चारू अपने आँसूओं को छिपाते हुए बोली ," चाचा जी हम वापस बनारस कब चलेंगे ?" चाचा ने एक गहरी सांस लेकर कहा ," चलेंगे" चारू ने आगे कुछ न पूछा वह समझ गयी कि चाचा के चलेंगे में दूर दूर तक चलने की आहट नहीं है ꫰ वह उठकर फिर लहरों को देखने लगी और प्रत्येक लहर में उसे रजत दिखाई पड़ता लेकिन स्पष्ट नहीं शायद कई दिनों की बिछुड़न उसे धुंधला बना रही थी ꫰
------© श्रव्या


दूसरे भाग के लिये तैयार रहें।

टिप्पणियाँ

  1. अगर मेरा खामोश रहना तुझको ,
    खुशी देता है,तब तो मैं तेरी खुशी के लिए हमेशा के लिऐ खामोश हो सकता हूं।

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