कौन हो तुम?
कौन हो तुम?
जो अंधेरों को उजालों से भरे जा रहे हो,
जो दुर्गम राहों पर निडर चले जा रहे हो।
इसे भी पढ़ें-जब चाय बने तब आना तुम
कौन हो तुम?
जो मृत्यु के भय से भयभीत भी है
जो हर डर को हरा दे ऐसी जीत भी है।
आखिर कौन हो तुम?
जो बस प्रहरी को भांति खड़ा है ,
जो निराकार होकर भी बहुत बड़ा है।
इसे भी पढ़ें-अधूरा एहसास
हो कौन तुम?
जिसको न कल की परवाह थी,
जिसको न कल की परवाह है।
हो कौन तुम?
जो न तो प्रत्यक्ष है,
न ही परोक्ष है।
इसे भी पढ़ें-कर्म लौटकर आया
हो कौन तुम?
जिसे सब साहस कहते हैं,
दुःख में जिसे ढाँढस कहते हैं।
तुम कौन हो?
जिसे समझने में मुश्किल है,
पर साथ हमारे हर पल है।
इसे भी पढें-याद उन यारों की
बस उसे ढूंढने की ज़रूरत है,
एक सोए कुम्भकर्ण की तरह,
जिसे अब जागने की ज़रूरत है।
तुम जो भी,
साहस हो या कोई निडर भाव,
भीतर से उठकर प्रत्यक्ष में आओ।
इसे भी पढ़ें-वो मजदूर है साहब
---©अभिषेक
जो अंधेरों को उजालों से भरे जा रहे हो,
जो दुर्गम राहों पर निडर चले जा रहे हो।
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कौन हो तुम?
जो मृत्यु के भय से भयभीत भी है
जो हर डर को हरा दे ऐसी जीत भी है।
आखिर कौन हो तुम?
जो बस प्रहरी को भांति खड़ा है ,
जो निराकार होकर भी बहुत बड़ा है।
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हो कौन तुम?
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हो कौन तुम?
जो न तो प्रत्यक्ष है,
न ही परोक्ष है।
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हो कौन तुम?
जिसे सब साहस कहते हैं,
दुःख में जिसे ढाँढस कहते हैं।
तुम कौन हो?
जिसे समझने में मुश्किल है,
पर साथ हमारे हर पल है।
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बस उसे ढूंढने की ज़रूरत है,
एक सोए कुम्भकर्ण की तरह,
जिसे अब जागने की ज़रूरत है।
तुम जो भी,
साहस हो या कोई निडर भाव,
भीतर से उठकर प्रत्यक्ष में आओ।
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---©अभिषेक
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