वो मजदूर है साहब|
वो चलता है मीलों फिर भी,
उसके चलने की आवाज़ नहीं होती|
उठाता है भार क्षमता से अधिक,
फिर भी आवाज़ में उसकी आह नहीं होती|
वो मजदूर है साहब,
फटा पहनता है, नंगे पैर चलता है,
क्योकि और अधिक की उसे प्यास नहीं होती|
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वो सुनता है कटाक्ष और गालियाँ,
उसे प्यार भरे शब्दों की चाह नहीं होती|
चाहता है दो जून की रोटी और दाल,
पर वो मजदूर है साहब,
सूखी रोटी तो होती है,
पर कटोरी में दाल नहीं होती|
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नींद की वजह से वो तारे नहीं गिन पाता,
बरसात में कोई अचकन सूखी नहीं होती|
आखिर वो मजदूर है साहब,
उसके पैरों तले ज़मीन तो होती है,
पर सर पर छत नही होती|
इसे पढ़ें-न जानो मुझे
--------------------------------------©अभिषेक
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