कुछ ख़्वाहिशें हैं तुमसे

एक गुज़ारिश है तुमसे,
जब बाल खोल कर आया करो,
लटों को यूं सहलाया न करो,
हटा कर केश चेहरे से
जाल से बिखराया न करो।
                       इसे पढ़ें-    अधूरा एहसास
एक और गुज़ारिश है,
जब कुछ बोलूं तो इठलाया न करो,
अपने गालों को हौले से सहलाया न करो,
गुस्से में होती हो तो बस
लबों को दांतों से दाबाया न करो।
                        इसे पढ़ें- नज़रों के मिलते ही
एक नन्हीं गुज़ारिश और है,
जब भी देखूं तो मुझे देख मुस्काया न करो,
हर बात की मेरी नकल दोहराया न करो,
जानती हो तुम मुझे शिकवा नहीं तो
हर बात का मतलब समझाया न करो।
                         इसे पढ़ें-कर्म लौटकर आया है
गुज़रिशें तो और बहुत हैं,
वो जो हौले से हाथों को छू जाती हो,
मेरी हर कविता के भाव में खो जाती हो,
जो छू जाते हैं शब्द सागर की लहरों से,
तो क्यों नहीं मुझे सपनों में  चूम जाती हो।
                          इसे पढ़ें-सफ़र लम्बा था क्या?
कुछ और भी है कह रहा,
जो दूर हो मुझसे मेरे पास होकर भी,
फिर क्यों दिलों के तार छेड़ जाती हो,
जानती हो तुम मुझे मैं जी नहीं सकता,
तभी तुम रोज़ मिलकर भी रेत सी छूट जाती हो।
-----©अभिषेक

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