संदेश

अधूरा एहसास

कोई राज़ है, अल्फ़ाज़ में कोई आज है, कोई आज में।                   इसे पढ़ें- लघु कथा( कर्म लौटकर आया) तुम कौन हो?, मैं कौन हूँ?, एक साज़ है एक साज़ में। तुम शोर हो, मैं शांत हूँ, एक बात है एक बात में।                 इसे पढें- सफर लम्बा था क्या? तुम सर्व हो मैं शून्य हूँ, एक पाठ है, एक पाठ में। वो नाम है, वो गुमनाम है, एक शाम है, एक शाम में।                  इसे पढ़ें- न जानो मुझे वो प्यास है, वो दर्द है, एक आस है, एक आस में। जो लिख दिया, जो न लिखा, एक सार है, एक सार में।                  इसे पढ़ें- वो मज़दूर है साहब। कुछ बात है, कुछ खास है, इस अधूरे एहसास में।          -----©अभिषेक

वो मजदूर है साहब|

वो चलता है मीलों फिर भी, उसके चलने की आवाज़ नहीं होती| उठाता है भार क्षमता से अधिक, फिर भी आवाज़ में उसकी आह नहीं होती| वो मजदूर है साहब, फटा पहनता है, नंगे पैर चलता है, क्योकि और अधिक की उसे प्यास नहीं होती|                                              इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया(कहानी) वो सुनता है कटाक्ष और गालियाँ, उसे प्यार भरे शब्दों की चाह नहीं होती| चाहता है दो जून की रोटी और दाल, पर वो मजदूर है साहब, सूखी रोटी तो होती है, पर कटोरी में दाल नहीं होती|                                               इसे पढ़ें- जाने क्यों हमको भूल गए?( कविता ) नींद की वजह से वो तारे नहीं गिन पाता, बरसात में कोई अचकन सूखी नहीं होती| आखिर वो मजदूर है साहब, उसके पैरों तले ज़मीन तो होती है, पर सर पर छत नही होती|             ...

लघु कथा 3( कर्म लौटकर आया)

कार की सीट पर सीट बेल्ट लगाए हुए पूरी तरह से चौकन्ना और एसी चालू होने के बावजूद पसीने से लतपथ, कार की स्टीयरिंग व्हील को तेजी के साथ दाएं बाएं घुमाकर, कार को नियंत्रित करने की ...

जाने क्यों हमको भूल गए!

हवा बसंती इठलाकर जो छू ले लू सी हो जाये, जो पुष्प मनोहर सुगंध बिखेरे मुरझा वो सारे फूल गए, जो कहते थे कि संगी हैं हम अब जाने क्यों हमको भूल गए? मधुर लगी वाणी जिनकी उनके शब्द शूल ...

यूनिवर्सिटी रिजल्ट (व्यंग्य)

गौ रक्षा की शपथ लै लिया, चरैबे बकरी लैके डंडा। देख के यूनिवर्सिटी केर रिजल्ट, ख्वाब भै गवा ठंडा। सरकारी टीचर होवे के खातिर चहिये 55 परसेंट। जांच दिहिन 36 मा कापी लगा कोबरा सेंट...

नज़रों के मिलते ही

नजरों के मिलते ही तेरी नज़रें जो झुक जाती हैं, कसम से मेरी दुनिया  बस वहीँ रुक जाती है, तेरी उंगलियाँ मेरी उँगलियों से गलती से जो छू जाती हैं, मेरे तन बदन में बिजली सी दौड़ जाती है|                                                                    इसे भी पढ़ें- सफर लम्बा था क्या? जब इन मूक आँखों से सबकुछ बोल जाती हो, सारे अनकहे राज़ बिन पूछे ही खोल जाती हो, जो होठों से बरसाती हो फूल महक वाले, क्या हमारे कत्ल को ये बाल खोल आती हो|                                                               ...

न जानो मुझे|

न देखो मुझे, न जानो मुझे, दूर रहो अब मुझसे तुम, बेहतर है न पहचानो मुझे।                                                          इसे भी पढ़ें- 70 बरस नहीं हैं थक गया हूँ खिलौना बनकर, कभी ज्यादा तो कभी थोड़ा बनकर, बेहतर है आज़ाद मर जाने दो मुझे।                                                           इसे भी पढ़ें- जवाब नहीं मिलते न अभी तक ऐसा कोई आया है, जो मेरे हाल-ए-दिल को समझ पाया है, छोड़ो अब एक पहेली ही रह जाने दो मुझे।   ...

बेवफ़ा चांद

चांद भी अमावस को गायब हुआ किसी और के दीदार को। लो उठा दिया है पर्दा हमने, अब सफाई न दे संसार को। इसे भी पढ़ें- सफ़र लम्बा था क्या? जो पढ़ लिया है ख़ता खत अपना, तो चले जाओ जहां जाते रहते हो। नही भा रही अब चांदनी तुम्हारी, क्यों मुझे इनसे झुलसा रहे हो। इसे भी पढ़ें- 70 बरस नहीं हैं वो झूठे मोहब्बत के वादे हैं सारे, जो तुम सभी से किये जा रहे हो। घटती हैं तेरी हर पक्ष कलाएं, फिर भी रूप पे क्यो इतरा रहे हो। इसे भी पढ़ें- कविता संख्या 1 आशिकों के इश्क़ को उड़ान देकर क्यों तुम उन्हें उन्हीं से हरा रहे हो। लो कह दिया हर गिला तुमसे, फिर भी मुझ पर मुस्करा रहे हो। चांद हो तो क्या हुआ, बदकिस्मत हो बस दिन रात चले जा रहे हो।                              -----------------------------©अभिषेक

सफर लम्बा था क्या?

तेरी आँखों में समा जाने से तेरे दिल में उतर जाने का सफ़र लंबा था क्या? वो तुझे छुप छुप कर निहारने से अपने हाथों से सवारने का सफ़र लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई| वो अपने हाथ से तेरे हाथों को मिलाने से हाथों का गालों को छू जाने का सफ़र लम्बा था क्या? मेरे लबों से तेरी बातें निकलने से अब होठों से होठों के मिल जाने का सफर लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई| वो साथ की बातें और बातों में झगड़ों से इश्क के इज़हार का सफ़र लम्बा था क्या? तेरी मुस्कान के ज़िन्दगी बन जाने से मुस्कान के नफरत में बदल जाने का सफ़र लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई| तेरी मोहब्बत में सब कुछ हार जाने से तुझे ही हार जाने तक का सफ़र लम्बा था क्या? तुझसे किये हर वादे को निभाने से खुद को भूल जाने का सफ़र लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई|                                 ------------------------------©अभिषेक

लघु कथा 2 (70 बरस नहीं हैं!)

सर्दियों की ख़ास बात ये होती है कि जो धूप आपको मई के महीने में दुश्मन लगती है उसी से आपको प्यार हो जाता है, धूप में बैठना या छत पर चटाई डालकर आलस का अनुभव करना सबसे बड़ा सुख होता है सर्दियों का| इसी तरह की सर्दी पड़ रही थी हमारी नानी और नाना जी बाहर कुर्सियों पर धूप का आनंद ले रहे थे कि तभी कुछ लोग जो कि शक्ल से किसी संस्था से जुड़े लग रहे थे, हर घर में खटखटा कर चंदा की मांग कर रहे थे| तभी उनमें से एक व्यक्ति जो की उन सबका सरदार लग रहा था नाना जी के पास आया और बोला- बच्चा तेरे अब दिन नहीं बचे हैं अब तुझे बहुत जल्द ही बीमारी घेर लेगी तू नहीं बचेगा| नानी को पता नहीं क्या सूझी उन्होंने उन तथा कथित बाबा जी को बे सम्मान से पुकारा और कहा की बाबा जी हमारा भी कुछ बताओ हम कब तक जियेंगे| बाबा बड़े आत्मविश्वास से बोला की- आप तो अभी अपनी 70 की उम्र देखोगी| मेरी नानी के चेहरे पे एक अजीब मुस्कान थी जो तब होती है जब हम किसी का झूठ पकड़ लें और वो व्यक्ति अपने झूठ को जारी रखे| उसके इस जवाब के बाद नानी ने नाना को इशारा किया और नाना ने अपनी जेब से 20 का नोट निकाल कर उस बाबा को पकड़ा दिया वो अपने झूठे आशीर...