संदेश

यूनिवर्सिटी रिजल्ट (व्यंग्य)

गौ रक्षा की शपथ लै लिया, चरैबे बकरी लैके डंडा। देख के यूनिवर्सिटी केर रिजल्ट, ख्वाब भै गवा ठंडा। सरकारी टीचर होवे के खातिर चहिये 55 परसेंट। जांच दिहिन 36 मा कापी लगा कोबरा सेंट...

नज़रों के मिलते ही

नजरों के मिलते ही तेरी नज़रें जो झुक जाती हैं, कसम से मेरी दुनिया  बस वहीँ रुक जाती है, तेरी उंगलियाँ मेरी उँगलियों से गलती से जो छू जाती हैं, मेरे तन बदन में बिजली सी दौड़ जाती है|                                                                    इसे भी पढ़ें- सफर लम्बा था क्या? जब इन मूक आँखों से सबकुछ बोल जाती हो, सारे अनकहे राज़ बिन पूछे ही खोल जाती हो, जो होठों से बरसाती हो फूल महक वाले, क्या हमारे कत्ल को ये बाल खोल आती हो|                                                               ...

न जानो मुझे|

न देखो मुझे, न जानो मुझे, दूर रहो अब मुझसे तुम, बेहतर है न पहचानो मुझे।                                                          इसे भी पढ़ें- 70 बरस नहीं हैं थक गया हूँ खिलौना बनकर, कभी ज्यादा तो कभी थोड़ा बनकर, बेहतर है आज़ाद मर जाने दो मुझे।                                                           इसे भी पढ़ें- जवाब नहीं मिलते न अभी तक ऐसा कोई आया है, जो मेरे हाल-ए-दिल को समझ पाया है, छोड़ो अब एक पहेली ही रह जाने दो मुझे।   ...

बेवफ़ा चांद

चांद भी अमावस को गायब हुआ किसी और के दीदार को। लो उठा दिया है पर्दा हमने, अब सफाई न दे संसार को। इसे भी पढ़ें- सफ़र लम्बा था क्या? जो पढ़ लिया है ख़ता खत अपना, तो चले जाओ जहां जाते रहते हो। नही भा रही अब चांदनी तुम्हारी, क्यों मुझे इनसे झुलसा रहे हो। इसे भी पढ़ें- 70 बरस नहीं हैं वो झूठे मोहब्बत के वादे हैं सारे, जो तुम सभी से किये जा रहे हो। घटती हैं तेरी हर पक्ष कलाएं, फिर भी रूप पे क्यो इतरा रहे हो। इसे भी पढ़ें- कविता संख्या 1 आशिकों के इश्क़ को उड़ान देकर क्यों तुम उन्हें उन्हीं से हरा रहे हो। लो कह दिया हर गिला तुमसे, फिर भी मुझ पर मुस्करा रहे हो। चांद हो तो क्या हुआ, बदकिस्मत हो बस दिन रात चले जा रहे हो।                              -----------------------------©अभिषेक

सफर लम्बा था क्या?

तेरी आँखों में समा जाने से तेरे दिल में उतर जाने का सफ़र लंबा था क्या? वो तुझे छुप छुप कर निहारने से अपने हाथों से सवारने का सफ़र लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई| वो अपने हाथ से तेरे हाथों को मिलाने से हाथों का गालों को छू जाने का सफ़र लम्बा था क्या? मेरे लबों से तेरी बातें निकलने से अब होठों से होठों के मिल जाने का सफर लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई| वो साथ की बातें और बातों में झगड़ों से इश्क के इज़हार का सफ़र लम्बा था क्या? तेरी मुस्कान के ज़िन्दगी बन जाने से मुस्कान के नफरत में बदल जाने का सफ़र लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई| तेरी मोहब्बत में सब कुछ हार जाने से तुझे ही हार जाने तक का सफ़र लम्बा था क्या? तुझसे किये हर वादे को निभाने से खुद को भूल जाने का सफ़र लम्बा था क्या? होगा, पर मुझे नींद नहीं आई|                                 ------------------------------©अभिषेक

लघु कथा 2 (70 बरस नहीं हैं!)

सर्दियों की ख़ास बात ये होती है कि जो धूप आपको मई के महीने में दुश्मन लगती है उसी से आपको प्यार हो जाता है, धूप में बैठना या छत पर चटाई डालकर आलस का अनुभव करना सबसे बड़ा सुख होता है सर्दियों का| इसी तरह की सर्दी पड़ रही थी हमारी नानी और नाना जी बाहर कुर्सियों पर धूप का आनंद ले रहे थे कि तभी कुछ लोग जो कि शक्ल से किसी संस्था से जुड़े लग रहे थे, हर घर में खटखटा कर चंदा की मांग कर रहे थे| तभी उनमें से एक व्यक्ति जो की उन सबका सरदार लग रहा था नाना जी के पास आया और बोला- बच्चा तेरे अब दिन नहीं बचे हैं अब तुझे बहुत जल्द ही बीमारी घेर लेगी तू नहीं बचेगा| नानी को पता नहीं क्या सूझी उन्होंने उन तथा कथित बाबा जी को बे सम्मान से पुकारा और कहा की बाबा जी हमारा भी कुछ बताओ हम कब तक जियेंगे| बाबा बड़े आत्मविश्वास से बोला की- आप तो अभी अपनी 70 की उम्र देखोगी| मेरी नानी के चेहरे पे एक अजीब मुस्कान थी जो तब होती है जब हम किसी का झूठ पकड़ लें और वो व्यक्ति अपने झूठ को जारी रखे| उसके इस जवाब के बाद नानी ने नाना को इशारा किया और नाना ने अपनी जेब से 20 का नोट निकाल कर उस बाबा को पकड़ा दिया वो अपने झूठे आशीर...

लघु कथा 1 ( आखिर टुकड़े हो ही गए )

घर में संग्राम छिड़ा हुआ था माँ और बेटे के बीच, बेटा जो कि अभी यही कोई पंद्रह बरस का होगा अपनी जिद पर अड़ा हुआ था और वो 45 वर्षीय महिला जो कि बेड रेस्ट पर थी अपनी जिद पे अटल थीं | बड़ा लड़का अपनी धुन में था हालांकि सब कुछ सुन रहा था पर कुछ कह नहीं रहा था |अब जिद कुछ इस बात की थी कि छोटे लड़के ने अनार का जूस निकाला था जो कि मात्र एक ही गिलास निकला था| माँ की जिद थी कि उस एक गिलास में भी तीन हिस्से हों और तीनों लोग मिल कर जूस का सेवन करें, और छोटा लड़का इस बात पे राजी न था उसका कहना था कि अभी आप बीमारी से सही हो रही हो तो आपको इस जूस की ज़रुरत है और वो इस गिलास के और हिस्से न होने देगा| अब माँ कहाँ किसी कि मानने वाली थी उसने बी जिद पकड़ ली की अब तो गिलास के जूस के हिस्से होकर रहेंगे| जब छोटे लड़के को ये लगा की अकेले वो माँ से नहीं जीत सकता तो वो बड़े लड़के के पास गया और कहा कि समझाओ एक तो इत्ता सा जूस है उसमें भी इन्हें तीन भाग करते हैं | बड़ा लड़का बस इतना ही बोला कि वो कुछ नहीं कर सकता है क्योंकि करनी माँ को अपने मन की ही है| शायद बीमार होने पे इंसान कुछ ज्यादा ही जिद्दी हो जाता है| अब ज...

कविता संख्या 13 (बेटियां बोझ नहीं होती)

        इसे भी पढ़ें- कविता संख्या 8                           जवाब नहीं मिलते बचपन में प्यार की थपकी दी थी, आज फिर से गले लगाओ न पापा| हाथ पकड़ के चलना सिखाया, आज गिरने से बचा लो न पापा| लोरी सुना के सपने दिखाए, आज उन्हें पूरा करने से न रोको पापा| हर गम से दूर रखा था मुझे, आज ज़ख्मों पे नमक न डालो पापा| दुनिया की सारी ख़ुशी क़दमों में रखी थी, आज दर्द दे कर न रुलाओ पापा| ऊँचा उड़ने की सीख सिखाकर, आज उड़ने से तो न रोको पापा| मेरी हर ख्वाहिश  को पूरा किया है, आज उसे मेरा बना दो न पापा| एक गलती हो गयी मुझसे, उसकी यूँ सजा तो न दो पापा| माना बेटी हूँआपकी, एक बार बेटा बनाके गले लगाओ न पापा| आपकी मुस्कान अच्छी है, बस मेरे लिए एक बार, मेरे लिए मुस्कराओ न पापा| दुनिया बहुत मतलबी है, मुझे अपने साए में छुपाओ न पापा| सबने अकेले छोड़ दिया है, आप तो मुंह मोड़कर न जाओ पापा|     एक दिन तो मुझे जाना ही है, कुछ दिन तो साथ बिठाओ न पापा|  बहुत तडपी ह...

कविता संख्या 12(मैंने खुद को बड़ा होते देखा है)

आज मैंने अपने बचपन को मुड़कर देखा है, बचपन के उस भोलेपन को भी देखा है| तब ख़्वाबों की दुनिया बसाई थी मैंने, और छोटे-छोटे ख़्वाबों को मुक्कमल होते देखा है| फिर अपनी नींद से ख़्वाबों को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|                 इसे भी पढ़ें- जवाब नहीं मिलते मुझे अपनी वो ज़िद भी याद है, मैंने नानी को ज़िद पूरा करते देखा है| जब-जब परेशान हुआ हूँ हालातों से, मैंने उनकी गोद का नज़ारा भी देखा है| फिर अपने सर को गोद से अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|                 इसे भी पढ़ें- हम दूर हो जायेंगे मुझे बचपन के आंसुओं की नदियाँ भी याद हैं, हर बात पे अपना पसर जाना भी देखा है| मैं आंसुओं से अपनी बात मनवाता था, इस बात पे माँ बाप का दुलार भी देखा है| फिर अपनी आँखों से आंसुओं को अलग होते देखा है, हाँ, मैंने खुद को बड़ा होते देखा है|          ...

कविता संख्या 11(जवाब नहीं मिलते)

मुझे जब कुछ सवालों के जवाब नहीं मिलते, मैं जानता हूँ कि बेचैन परिंदों को आसमान नहीं मिलते, पर तड़पता हूँ फ़िर भी मैं उस जवाब के लिए, जिस जवाब को लोगों के अल्फ़ाज़ नहीं मिलते। लोग कहते हैं लिखते हो तुम मन की ज़ुबाँ, क्योंकि हम बिखरे हुओं को हमराज़ नहीं मिलते, ज़िन्दगी वीरान है वीरान ही रखूंगा कुछ इस तरह जैसे उफ़नाते समंदर को जहाज़ नहीं मिलते। सब घिरे हुए हैं झूठ फ़रेब और बेईमानी के जालों में, जीवन की इन राहों में सच्चे हमराह नहीं मिलते, सरकी सारी सकल जवानी हालातों से लड़ने में, अक्सर ऐसी जंगों में डंटने वाले जाबांज़ नहीं मिलते। मैं शिद्दत से लिखता हूँ हर भाव निचोड़कर आज़ादी के, क्योंकि शब्दों के इस खेल में लफ्ज़ आज़ाद नहीं मिलते, हालांकि हम ज़रूरतमंदों को ऊंची आवाज़ नहीं मिलती, पर हम लड़ते हैं, सवाल करते हैं, फिर भी जवाब नहीं मिलते।    ----------------------------©अभिषेक