संदेश

आखिर, किसने है।

इश्क को इश्क का नाम आखिर दिया किसने है, मुझको तुझे इनाम में आखिर दिया किसने है। जो मांगा था टुकड़ा चांद का ये पूरा चांद दिया किसने है, हूर हो या ख्वाब, ऐसा श्रंगार आखिर किया किसने है। तुम राधा हो तो मुझे श्याम आखिर कहा किसने है, ये यारी को बदनाम आखिर किया किसने है। मुझको तुझे इनाम में आखिर दिया किसने है।                                 इन्हें भी पढें- कोरे पन्ने                                                   मैं तो बस मैं हूँ। ---- अभिषेक

कोरे पन्ने

आज फिर कुछ खाली पन्ने लेकर बैठा हूँ, बिल्कुल कोरे बिल्कुल खरे, बिल्कुल मेरे बालमन जैसे, वैसे जैसे कॉपी की शुरुआत में होते हैं। बिल्कुल साफ बिल्कुल सुंदर, बिल्कुल मेरे बालकर्म जैसे, वैसे जैसे कॉपी की पहली लिखावट होती है। कुछ नीला कुछ काला रंग, बिल्कुल खट्टी मीठी यादों जैसे, वैसा जैसा बिल्कुल पहला पाठ होता है। पर ये तो 20 वां पाठ है, अब तक जाने कितने पन्ने रंग डाले, कुछ सुंदर कुछ गड़बड़ से, कुछ बिल्कुल बदसूरत से, वैसे जैसे कॉपी का आखिरी पन्ना होता है। पर फिर नया पाठ शुरू होता है, नई कॉपी शुरू होती है, वैसे जैसे फिर से नया दिन शुरू होता है। अब वो कोरे पन्ने मेरे हैं, अब मैं समझदार हूँ, वैसे जैसे किताबों के लेखक होते हैं। अब इन पन्नों पर सुंदर लिखना है, बिल्कुल पहले पन्ने जैसा हर पन्ना, वैसे जैसे लेखक किताब लिखते हैं। पर वादा है फिर गलती होगी, फिर कहीं न कहीं गड़बड़ होगी, वैसे जैसे डायरी पर विचारों को काट देता हूँ। क्योंकि पन्ने मेरे हैं, विचार मेरे हैं, जो करना है अब अपने अंदाज़ में करता हूँ।  ---©अभिषेक  इन्हें भी पढ़ें- कौन हो तुम? मैं त...

मैं तो बस मैं हूँ

मैं तो बस मैं हूँ, न मुझे राह की परवाह है, मुझे न डर, न  सुकून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कौन हो तुम? लड़ता हूँ खुद से, हर हार का हमराही हूँ, मुझे न जीत, न जुनून चाहिए।                       इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया। जो मंज़िल दूर है, तो रहने दो उसे दूर ही मुझसे, न गाड़ी, न पत्थर का मकान चाहिए। जो कहते हैं तुमसे, कि बनो बेहतर हर जगह पर, न उपलब्धि, न ही मुझे नाम चाहिये। हां चुनता हूँ शब्द, क्योंकी न समझाना है खुद को, न लोगों का झूठा यक़ीन चाहिए। कैसे छोड़ दूं हर सीख को, जब भी गिरा हूँ, उठा हूँ, वापस बढ़ा हूँ, मुझे न जीतना है न इनाम चाहिए। मुझसे कहती है मेरी माँ, मुझे तू अफसर जैसा नहीं, बस एक बेहतर इंसान चाहिए। ---©अभिषेक

तुम तो निर्णय कर चुकी।

आज है बस मेरे पास, कल तू कहीं मैं कहीं, सोचता हूँ कह दूं तुझे, पर क्या शब्द वो काम करेंगे, शब्दों में कैसे पिरोऊँ वो बातें, जिन्हें समेटने में सालों लगे, अब सोचता हूँ कह दूं, पर क्या करोगी सुनकर, तुम तो निर्णय कर चुकी हो, सौ बार सोच समझ चुकी हो।                     इसे भी पढ़ें- कौन हो तुम? तुमको मुझसे क्या, मैं तो जैसे हवा का झोंका था, आया और बाल बिखरा गया, सच तो ये है कि मैं कुछ लाया था, हां वही अजीब सी सुगन्ध, जो तुमको उर्जावान करती थी, जो तुमको छूकर महक उठती थी, जो हर बार तुझे झकझोरती थी, तुझसे कहने की कोशिश करती थी, मेरी कहानी, पर तुमको क्या?, तुम तो निर्णय कर चुकी थी। --©अभिषेक

कौन हो तुम?

कौन हो तुम? जो अंधेरों को उजालों से भरे जा रहे हो, जो दुर्गम राहों पर निडर चले जा रहे हो।                             इसे भी पढ़ें- जब चाय बने तब आना तुम कौन हो तुम? जो मृत्यु के भय से भयभीत भी है जो हर डर को हरा दे ऐसी जीत भी है।                             आखिर कौन हो तुम? जो बस प्रहरी को भांति खड़ा है , जो निराकार होकर भी बहुत बड़ा है।                            इसे भी पढ़ें- अधूरा एहसास हो कौन तुम? जिसको न कल की परवाह थी, जिसको न कल की परवाह है।                           हो कौन तुम? जो न तो प्रत्यक्ष है, न ही परोक्ष है।                            इसे भी पढ़ें- कर्म लौटकर आया हो कौन तुम? जिसे सब साहस कहते हैं, दुःख में जिसे ढाँ...

संगी कविता

(1) ठहर जाओ कुछ पल के लिए क्यों टालती हो हर बात कल के लिए, जो पूछता हूँ बस बोल दो क्यों सकुचाती हो पहल के लिए, लो बात जो तुम कहती वो शुरू मैं कर रहा हूँ, तुम हां या न कह दो, मैं तो कब से तुमको सुन रहा हूँ। ----©अभिषेक (2) आ गया हूं  खुद को भी छोड़कर छोड़कर बंधन सारे, सारी रश्में, रश्में जो बांधती थीं मुझको घर से, घर से निकला हूँ यह सोचकर, सोचकर कि तुममे सिमट जाऊंगा जाऊंगा जहाँ तुम साथ हो, हो चाहें जहां या सिर्फ हो आसमां, आसमां ही छत होगी ज़मीन बिस्तर, बिस्तर पर मैं तुझमें सिमट जाऊंगा।  --©अभिषेक

अब जब चाय बने तब,

जब पानी में शक्कर घुले तब आना तुम, जब चाय की लाली चढ़े तब आना तुम, एक अदरक सी कड़क बात बोलेंगे, सारे उलझे हुए रिश्ते के तार खोलेंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम। खुशबू मिले इलायची की तब आना तुम, दूध पर गेहुंआ रंग चढ़े तब आना तुम, छन्नी सी बातों से कड़वाहट हटाएंगे, पकड़ के सहारे रिश्ते कप बनाएंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम।  ----©अभिषेक

जो मिली दोबारा हमसे तो,

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जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम, कुछ अपना कहती दर्द और, हाल हमारा सुनती तुम, या चुप रहती बस आंखों को, राज़ उगलने देती तुम, लफ्ज़ तुम्हारे उलझ गए पर मुस्कान बिखरने देती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम। जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम, छोड़ गई थी कभी हमें बस नयनों को छलका देती, लो मान लिया मजबूरी थी बस बालों को लहरा देती, मिले दोबारा किस्मत से बस मन की बात समझती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम।   --©अभिषेक

याद उन यारों की।

कुछ यारों की याद आज भी आती है, जो आंखों से बूंदों की बरसात भी लाती है, अविस्मरणीय यादों की ठंडी हवा, हौले से गालों को छूकर जाती है। पर हम बड़े हो गए हैं और सब बदल गया है, वो लम्हा एक सपने सा फिसल गया है।                             इसे भी पढ़ें- कुछ ख़्वाहिशें हैं तुमसे वो सारी बातें हम बहुत पीछे छोड़ आये हैं, यादों को डायरी के पन्नों में मोड़ आये हैं। वो जो मोड़ पर छोड़ आये हैं, एक सुनहरी दुनिया, मंज़िल पर मिलेंगे हम फिर, ऐसे वादों से राहों को जोड़ आये हैं। इन समझदारों की दुनिया के काबिल बनने को, कुछ नासमझ से रिश्तों को तोड़ आये हैं।                                इसे भी पढ़ें- अधूरा एहसास हां यारों की यारी अब हमारी हमराही नहीं, पर हर जज़्बात को बक्से में समेट लाये हैं। खुद ही जलाए थे जो दिए प्यार के, उन्हें राहों में यूँही जलता छोड़ आये हैं। हां हम उन्हें उनकी दुनिया में, किसी और के हाथों सौंप आये हैं।      -...

कुछ ख़्वाहिशें हैं तुमसे

एक गुज़ारिश है तुमसे, जब बाल खोल कर आया करो, लटों को यूं सहलाया न करो, हटा कर केश चेहरे से जाल से बिखराया न करो।                        इसे पढ़ें-    अधूरा एहसास एक और गुज़ारिश है, जब कुछ बोलूं तो इठलाया न करो, अपने गालों को हौले से सहलाया न करो, गुस्से में होती हो तो बस लबों को दांतों से दाबाया न करो।                         इसे पढ़ें-  नज़रों के मिलते ही एक नन्हीं गुज़ारिश और है, जब भी देखूं तो मुझे देख मुस्काया न करो, हर बात की मेरी नकल दोहराया न करो, जानती हो तुम मुझे शिकवा नहीं तो हर बात का मतलब समझाया न करो।                          इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया है गुज़रिशें तो और बहुत हैं, वो जो हौले से हाथों को छू जाती हो, मेरी हर कविता के भाव में खो जाती हो, जो छू जाते हैं शब्द सागर की लहरों से, तो क्यों नहीं मुझे सपनों में  चूम जाती हो।       ...