बेवफ़ा चांद
चांद भी अमावस को गायब हुआ किसी और के दीदार को। लो उठा दिया है पर्दा हमने, अब सफाई न दे संसार को। इसे भी पढ़ें- सफ़र लम्बा था क्या? जो पढ़ लिया है ख़ता खत अपना, तो चले जाओ जहां जाते रहते हो। नही भा रही अब चांदनी तुम्हारी, क्यों मुझे इनसे झुलसा रहे हो। इसे भी पढ़ें- 70 बरस नहीं हैं वो झूठे मोहब्बत के वादे हैं सारे, जो तुम सभी से किये जा रहे हो। घटती हैं तेरी हर पक्ष कलाएं, फिर भी रूप पे क्यो इतरा रहे हो। इसे भी पढ़ें- कविता संख्या 1 आशिकों के इश्क़ को उड़ान देकर क्यों तुम उन्हें उन्हीं से हरा रहे हो। लो कह दिया हर गिला तुमसे, फिर भी मुझ पर मुस्करा रहे हो। चांद हो तो क्या हुआ, बदकिस्मत हो बस दिन रात चले जा रहे हो। -----------------------------©अभिषेक