कौन हो तुम?
कौन हो तुम? जो अंधेरों को उजालों से भरे जा रहे हो, जो दुर्गम राहों पर निडर चले जा रहे हो। इसे भी पढ़ें- जब चाय बने तब आना तुम कौन हो तुम? जो मृत्यु के भय से भयभीत भी है जो हर डर को हरा दे ऐसी जीत भी है। आखिर कौन हो तुम? जो बस प्रहरी को भांति खड़ा है , जो निराकार होकर भी बहुत बड़ा है। इसे भी पढ़ें- अधूरा एहसास हो कौन तुम? जिसको न कल की परवाह थी, जिसको न कल की परवाह है। हो कौन तुम? जो न तो प्रत्यक्ष है, न ही परोक्ष है। इसे भी पढ़ें- कर्म लौटकर आया हो कौन तुम? जिसे सब साहस कहते हैं, दुःख में जिसे ढाँ...