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कौन हो तुम?

कौन हो तुम? जो अंधेरों को उजालों से भरे जा रहे हो, जो दुर्गम राहों पर निडर चले जा रहे हो।                             इसे भी पढ़ें- जब चाय बने तब आना तुम कौन हो तुम? जो मृत्यु के भय से भयभीत भी है जो हर डर को हरा दे ऐसी जीत भी है।                             आखिर कौन हो तुम? जो बस प्रहरी को भांति खड़ा है , जो निराकार होकर भी बहुत बड़ा है।                            इसे भी पढ़ें- अधूरा एहसास हो कौन तुम? जिसको न कल की परवाह थी, जिसको न कल की परवाह है।                           हो कौन तुम? जो न तो प्रत्यक्ष है, न ही परोक्ष है।                            इसे भी पढ़ें- कर्म लौटकर आया हो कौन तुम? जिसे सब साहस कहते हैं, दुःख में जिसे ढाँ...

संगी कविता

(1) ठहर जाओ कुछ पल के लिए क्यों टालती हो हर बात कल के लिए, जो पूछता हूँ बस बोल दो क्यों सकुचाती हो पहल के लिए, लो बात जो तुम कहती वो शुरू मैं कर रहा हूँ, तुम हां या न कह दो, मैं तो कब से तुमको सुन रहा हूँ। ----©अभिषेक (2) आ गया हूं  खुद को भी छोड़कर छोड़कर बंधन सारे, सारी रश्में, रश्में जो बांधती थीं मुझको घर से, घर से निकला हूँ यह सोचकर, सोचकर कि तुममे सिमट जाऊंगा जाऊंगा जहाँ तुम साथ हो, हो चाहें जहां या सिर्फ हो आसमां, आसमां ही छत होगी ज़मीन बिस्तर, बिस्तर पर मैं तुझमें सिमट जाऊंगा।  --©अभिषेक

अब जब चाय बने तब,

जब पानी में शक्कर घुले तब आना तुम, जब चाय की लाली चढ़े तब आना तुम, एक अदरक सी कड़क बात बोलेंगे, सारे उलझे हुए रिश्ते के तार खोलेंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम। खुशबू मिले इलायची की तब आना तुम, दूध पर गेहुंआ रंग चढ़े तब आना तुम, छन्नी सी बातों से कड़वाहट हटाएंगे, पकड़ के सहारे रिश्ते कप बनाएंगे। और हां, ये होगा तब आना तुम, अब जब चाय बने तब आना तुम।  ----©अभिषेक

जो मिली दोबारा हमसे तो,

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जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम, कुछ अपना कहती दर्द और, हाल हमारा सुनती तुम, या चुप रहती बस आंखों को, राज़ उगलने देती तुम, लफ्ज़ तुम्हारे उलझ गए पर मुस्कान बिखरने देती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो, बात प्रीत की करती तुम। जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम, छोड़ गई थी कभी हमें बस नयनों को छलका देती, लो मान लिया मजबूरी थी बस बालों को लहरा देती, मिले दोबारा किस्मत से बस मन की बात समझती तुम, जो मिली दोबारा हमसे तो बात प्रीत की करती तुम।   --©अभिषेक

याद उन यारों की।

कुछ यारों की याद आज भी आती है, जो आंखों से बूंदों की बरसात भी लाती है, अविस्मरणीय यादों की ठंडी हवा, हौले से गालों को छूकर जाती है। पर हम बड़े हो गए हैं और सब बदल गया है, वो लम्हा एक सपने सा फिसल गया है।                             इसे भी पढ़ें- कुछ ख़्वाहिशें हैं तुमसे वो सारी बातें हम बहुत पीछे छोड़ आये हैं, यादों को डायरी के पन्नों में मोड़ आये हैं। वो जो मोड़ पर छोड़ आये हैं, एक सुनहरी दुनिया, मंज़िल पर मिलेंगे हम फिर, ऐसे वादों से राहों को जोड़ आये हैं। इन समझदारों की दुनिया के काबिल बनने को, कुछ नासमझ से रिश्तों को तोड़ आये हैं।                                इसे भी पढ़ें- अधूरा एहसास हां यारों की यारी अब हमारी हमराही नहीं, पर हर जज़्बात को बक्से में समेट लाये हैं। खुद ही जलाए थे जो दिए प्यार के, उन्हें राहों में यूँही जलता छोड़ आये हैं। हां हम उन्हें उनकी दुनिया में, किसी और के हाथों सौंप आये हैं।      -...

कुछ ख़्वाहिशें हैं तुमसे

एक गुज़ारिश है तुमसे, जब बाल खोल कर आया करो, लटों को यूं सहलाया न करो, हटा कर केश चेहरे से जाल से बिखराया न करो।                        इसे पढ़ें-    अधूरा एहसास एक और गुज़ारिश है, जब कुछ बोलूं तो इठलाया न करो, अपने गालों को हौले से सहलाया न करो, गुस्से में होती हो तो बस लबों को दांतों से दाबाया न करो।                         इसे पढ़ें-  नज़रों के मिलते ही एक नन्हीं गुज़ारिश और है, जब भी देखूं तो मुझे देख मुस्काया न करो, हर बात की मेरी नकल दोहराया न करो, जानती हो तुम मुझे शिकवा नहीं तो हर बात का मतलब समझाया न करो।                          इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया है गुज़रिशें तो और बहुत हैं, वो जो हौले से हाथों को छू जाती हो, मेरी हर कविता के भाव में खो जाती हो, जो छू जाते हैं शब्द सागर की लहरों से, तो क्यों नहीं मुझे सपनों में  चूम जाती हो।       ...

अधूरा एहसास

कोई राज़ है, अल्फ़ाज़ में कोई आज है, कोई आज में।                   इसे पढ़ें- लघु कथा( कर्म लौटकर आया) तुम कौन हो?, मैं कौन हूँ?, एक साज़ है एक साज़ में। तुम शोर हो, मैं शांत हूँ, एक बात है एक बात में।                 इसे पढें- सफर लम्बा था क्या? तुम सर्व हो मैं शून्य हूँ, एक पाठ है, एक पाठ में। वो नाम है, वो गुमनाम है, एक शाम है, एक शाम में।                  इसे पढ़ें- न जानो मुझे वो प्यास है, वो दर्द है, एक आस है, एक आस में। जो लिख दिया, जो न लिखा, एक सार है, एक सार में।                  इसे पढ़ें- वो मज़दूर है साहब। कुछ बात है, कुछ खास है, इस अधूरे एहसास में।          -----©अभिषेक

वो मजदूर है साहब|

वो चलता है मीलों फिर भी, उसके चलने की आवाज़ नहीं होती| उठाता है भार क्षमता से अधिक, फिर भी आवाज़ में उसकी आह नहीं होती| वो मजदूर है साहब, फटा पहनता है, नंगे पैर चलता है, क्योकि और अधिक की उसे प्यास नहीं होती|                                              इसे पढ़ें- कर्म लौटकर आया(कहानी) वो सुनता है कटाक्ष और गालियाँ, उसे प्यार भरे शब्दों की चाह नहीं होती| चाहता है दो जून की रोटी और दाल, पर वो मजदूर है साहब, सूखी रोटी तो होती है, पर कटोरी में दाल नहीं होती|                                               इसे पढ़ें- जाने क्यों हमको भूल गए?( कविता ) नींद की वजह से वो तारे नहीं गिन पाता, बरसात में कोई अचकन सूखी नहीं होती| आखिर वो मजदूर है साहब, उसके पैरों तले ज़मीन तो होती है, पर सर पर छत नही होती|             ...

लघु कथा 3( कर्म लौटकर आया)

कार की सीट पर सीट बेल्ट लगाए हुए पूरी तरह से चौकन्ना और एसी चालू होने के बावजूद पसीने से लतपथ, कार की स्टीयरिंग व्हील को तेजी के साथ दाएं बाएं घुमाकर, कार को नियंत्रित करने की ...

जाने क्यों हमको भूल गए!

हवा बसंती इठलाकर जो छू ले लू सी हो जाये, जो पुष्प मनोहर सुगंध बिखेरे मुरझा वो सारे फूल गए, जो कहते थे कि संगी हैं हम अब जाने क्यों हमको भूल गए? मधुर लगी वाणी जिनकी उनके शब्द शूल ...